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Thursday, February 28, 2019

Thoughts of famous Indian non-Muslim scholars about Islam इस्लाम के बारे में भारतीय ग़ैर-मुस्लिम विद्वानों के विचार

इस्लाम के बारे में भारतीय ग़ैर-मुस्लिम विद्वानों के विचार
In the Name of Allah the Most Gracious,
the Most MercifulThe following are some old and recent quotations from non-Muslim public figures from the eastern and western world, about Muhammad, may Allah bless him and grant him peace, the Messenger to entire humanity.

स्वामी विवेकानंद (विश्व-विख्यात धर्मविद्) ‘‘...
मुहम्मद (इन्सानी) बराबरी, इन्सानी भाईचारे और तमाम मुसलमानों के भाईचारे के पैग़म्बर थे। ...जैसे ही कोई व्यक्ति इस्लाम स्वीकार करता है पूरा इस्लाम बिना किसी भेदभाव के उसका खुली बाहों से स्वागत करता है, जबकि कोई दूसरा धर्म ऐसा नहीं करता। ...हमारा अनुभव है कि यदि किसी धर्म के अनुयायियों ने इस (इन्सानी) बराबरी को दिन-प्रतिदिन के जीवन में व्यावहारिक स्तर पर बरता है तो वे इस्लाम और सिर्फ़ इस्लाम के अनुयायी हैं। ...मुहम्मद ने अपने जीवन-आचरण से यह बात सिद्ध कर दी कि मुसलमानों में भरपूर बराबरी और भाईचारा है। यहाँ वर्ण, नस्ल, रंग या लिंग (के भेद) का कोई प्रश्न ही नहीं। ...इसलिए हमारा पक्का विश्वास है कि व्यावहारिक इस्लाम की मदद लिए बिना वेदांती सिद्धांत—चाहे वे कितने ही उत्तम और अद्भुत हों—विशाल मानव-जाति के लिए मूल्यहीन (Valueless) हैं...।’’ —‘टीचिंग्स ऑफ विवेकानंद, पृष्ठ-214, 215, 217, 218) अद्वैत आश्रम, कोलकाता-2004

स्वामी विवेकानंद (विश्व-विख्यात धर्मविद्)
‘‘...मुहम्मद (इन्सानी) बराबरी, इन्सानी भाईचारे और तमाम मुसलमानों के भाईचारे के पैग़म्बर थे। ...जैसे ही कोई व्यक्ति इस्लाम स्वीकार करता है पूरा इस्लाम बिना किसी भेदभाव के उसका खुली बाहों से स्वागत करता है, जबकि कोई दूसरा धर्म ऐसा नहीं करता। ...हमारा अनुभव है कि यदि किसी धर्म के अनुयायियों ने इस (इन्सानी) बराबरी को दिन-प्रतिदिन के जीवन में व्यावहारिक स्तर पर बरता है तो वे इस्लाम और सिर्फ़ इस्लाम के अनुयायी हैं। ...मुहम्मद ने अपने जीवन-आचरण से यह बात सिद्ध कर दी कि मुसलमानों में भरपूर बराबरी और भाईचारा है। यहाँ वर्ण, नस्ल, रंग या लिंग (के भेद) का कोई प्रश्न ही नहीं। ...इसलिए हमारा पक्का विश्वास है कि व्यावहारिक इस्लाम की मदद लिए बिना वेदांती सिद्धांत—चाहे वे कितने ही उत्तम और अद्भुत हों—विशाल मानव-जाति के लिए मूल्यहीन (Valueless) हैं...।’’ —‘टीचिंग्स ऑफ विवेकानंद, पृष्ठ-214, 215, 217, 218) अद्वैत आश्रम, कोलकाता-2004

मुंशी प्रेमचंद (प्रसिद्ध साहित्यकार)
‘‘...जहाँ तक हम जानते हैं, किसी धर्म ने न्याय को इतनी महानता नहीं दी जितनी इस्लाम ने। ...इस्लाम की बुनियाद न्याय पर रखी गई है। वहाँ राजा और रंक, अमीर और ग़रीब, बादशाह और फ़क़ीर के लिए ‘केवल एक’ न्याय है। किसी के साथ रियायत नहीं किसी का पक्षपात नहीं। ऐसी सैकड़ों रिवायतें पेश की जा सकती है जहाँ बेकसों ने बड़े-बड़े बलशाली आधिकारियों के मुक़ाबले में न्याय के बल से विजय पाई है। ऐसी मिसालों की भी कमी नहीं जहाँ बादशाहों ने अपने राजकुमार, अपनी बेगम, यहाँ तक कि स्वयं अपने तक को न्याय की वेदी पर होम कर दिया है। संसार की किसी सभ्य से सभ्य जाति की न्याय-नीति की, इस्लामी न्याय-नीति से तुलना कीजिए, आप इस्लाम का पल्ला झुका हुआ पाएँगे...।’’ ‘‘...जिन दिनों इस्लाम का झंडा कटक से लेकर डेन्युष तक और तुर्किस्तान से लेकर स्पेन तक फ़हराता था मुसलमान बादशाहों की धार्मिक उदारता इतिहास में अपना सानी (समकक्ष) नहीं रखती थी। बड़े से बड़े राज्यपदों पर ग़ैर-मुस्लिमों को नियुक्त करना तो साधारण बात थी, महाविद्यालयों के कुलपति तक ईसाई और यहूदी होते थे...।’’ ‘‘...यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि इस (समता) के विषय में इस्लाम ने अन्य सभी सभ्यताओं को बहुत पीछे छोड़ दिया है। वे सिद्धांत जिनका श्रेय अब कार्ल मार्क्स और रूसो को दिया जा रहा है वास्तव में अरब के मरुस्थल में प्रसूत हुए थे और उनका जन्मदाता अरब का वह उम्मी (अनपढ़, निरक्षर व्यक्ति) था जिसका नाम मुहम्मद (सल्ल॰) है। मुहम्मद (सल्ल॰) के सिवाय संसार में और कौन धर्म प्रणेता हुआ है जिसने ख़ुदा के सिवाय किसी मनुष्य के सामने सिर झुकाना गुनाह ठहराया है...?’’ ‘‘...कोमल वर्ग के साथ तो इस्लाम ने जो सलूक किए हैं उनको देखते हुए अन्य समाजों का व्यवहार पाशविक जान पड़ता है। किस समाज में स्त्रियों का जायदाद पर इतना हक़ माना गया है जितना इस्लाम में? ...हमारे विचार में वही सभ्यता श्रेष्ठ होने का दावा कर सकती है जो व्यक्ति को अधिक से अधिक उठने का अवसर दे। इस लिहाज़ से भी इस्लामी सभ्यता को कोई दूषित नहीं ठहरा सकता।’’ ‘‘...हज़रत (मुहम्मद सल्ल॰) ने फ़रमाया—कोई मनुष्य उस वक़्त तक मोमिन (सच्चा मुस्लिम) नहीं हो सकता जब तक वह अपने भाई-बन्दों के लिए भी वही न चाहे जितना वह अपने लिए चाहता है। ...जो प्राणी दूसरों का उपकार नहीं करता ख़ुदा उससे ख़ुश नहीं होता। उनका यह कथन सोने के अक्षरों में लिखे जाने योग्य है—‘‘ईश्वर की समस्त सृष्टि उसका परिवार है वही प्राणी ईश्वर का (सच्चा) भक्त है जो ख़ुदा के बन्दों के साथ नेकी करता है।’’ ...अगर तुम्हें ख़ुदा की बन्दगी करनी है तो पहले उसके बन्दों से मुहब्बत करो।’’ ‘‘...सूद (ब्याज) की पद्धति ने संसार में जितने अनर्थ किए हैं और कर रही है वह किसी से छिपे नहीं है। इस्लाम वह अकेला धर्म है जिसने सूद को हराम (अवैध) ठहराया है...।’’
—‘इस्लामी सभ्यता’ साप्ताहिक प्रताप विशेषांक दिसम्बर 1925


रामधारी सिंह दिनकर
(प्रसिद्ध साहित्यकार और इतिहासकार) जब इस्लाम आया, उसे देश में फैलने से देर नहीं लगी। तलवार के भय अथवा पद के लोभ से तो बहुत थोड़े ही लोग मुसलमान हुए, ज़्यादा तो ऐसे ही थे जिन्होंने इस्लाम का वरण स्वेच्छा से किया। बंगाल, कश्मीर और पंजाब में गाँव-के-गाँव एक साथ मुसलमान बनाने के लिए किसी ख़ास आयोजन की आवश्यकता नहीं हुई। ...मुहम्मद साहब ने जिस धर्म का उपदेश दिया वह अत्यंत सरल और सबके लिए सुलभ धर्म था। अतएव जनता उसकी ओर उत्साह से बढ़ी। ख़ास करके, आरंभ से ही उन्होंने इस बात पर काफ़ी ज़ोर दिया कि इस्लाम में दीक्षित हो जाने के बाद, आदमी आदमी के बीच कोई भेद नहीं रह जाता है। इस बराबरी वाले सिद्धांत के कारण इस्लाम की लोकप्रियता बहुत बढ़ गई और जिस समाज में निम्न स्तर के लोग उच्च स्तर वालों के धार्मिक या सामाजिक अत्याचार से पीड़ित थे उस समाज के निम्न स्तर के लोगों के बीच यह धर्म आसानी से फैल गया...। ‘‘...सबसे पहले इस्लाम का प्रचार नगरों में आरंभ हुआ क्योंकि विजेयता, मुख्यतः नगरों में ही रहते थे...अन्त्यज और निचली जाति के लोगों पर नगरों में सबसे अधिक अत्याचार था। ये लोग प्रायः नगर के भीतर बसने नहीं दिए जाते थे...इस्लाम ने जब उदार आलिंगन के लिए अपनी बाँहें इन अन्त्यजों और ब्राह्मण-पीड़ित जातियों की ओर पढ़ाईं, ये जातियाँ प्रसन्नता से मुसलमान हो गईं। कश्मीर और बंगाल में तो लोग झुंड-के-झुंड मुसलमान हुए। इन्हें किसी ने लाठी से हाँक कर इस्लाम के घेरे में नहीं पहुँचाया, प्रत्युत, ये पहले से ही ब्राह्मण धर्म से चिढ़े हुए थे...जब इस्लाम आया...इन्हें लगा जैसे यह इस्लाम ही उनका अपना धर्म हो। अरब और ईरान के मुसलमान तो यहाँ बहुत कम आए थे। सैकड़े-पच्चानवे तो वे ही लोग हैं जिनके बाप-दादा हिन्दू थे...। ‘‘जिस इस्लाम का प्रवर्त्तन हज़रत मुहम्मद ने किया था...वह धर्म, सचमुच, स्वच्छ धर्म था और उसके अनुयायी सच्चरित्र, दयालु, उदार, ईमानदार थे। उन्होंने मानवता को एक नया संदेश दिया, गिरते हुए लोगों को ऊँचा उठाया और पहले-पहल दुनिया में यह दृष्टांत उपस्थित किया कि धर्म के अन्दर रहने वाले सभी आपस में समान हैं। उन दिनों इस्लाम ने जो लड़ाइयाँ लड़ीं उनकी विवरण भी मनुष्य के चरित्रा को ऊँचा उठाने वाला है।’’ —
‘संस्कृति के चार अध्याय’ लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1994 पृष्ठ-262, 278, 284, 326, 317

अन्नादुराई (डी॰एमके॰ के संस्थापक, भूतपूर्व मुख्यमंत्री तमिलनाडु)
‘‘इस्लाम के सिद्धांतों और धारणाओं की जितनी ज़रूरत छठी शताब्दी में दुनिया को थी, उससे कहीं बढ़कर उनकी ज़रूरत आज दुनिया को है, जो विभिन्न विचारधाराओं की खोज में ठोकरें खा रही है और कहीं भी उसे चैन नहीं मिल सका है। इस्लाम केवल एक धर्म नहीं है, बल्कि वह एक जीवन-सिद्धांत और अति उत्तम जीवन-प्रणाली है। इस जीवन-प्रणाली को दुनिया के कई देश ग्रहण किए हुए हैं। जीवन-संबंधी इस्लामी दृष्टिकोण और इस्लामी जीवन-प्रणाली के हम इतने प्रशंसक क्यों हैं? सिर्फ़ इसलिए कि इस्लामी जीवन-सिद्धांत इन्सान के मन में उत्पन्न होने वाले सभी संदेहों ओर आशंकाओं का जवाब संतोषजनक ढंग से देते हैं। अन्य धर्मों में शिर्व$ (बहुदेववाद) की शिक्षा मौजूद होने से हम जैसे लोग बहुत-सी हानियों का शिकार हुए हैं। शिर्क के रास्तों को बन्द करके इस्लाम इन्सान को बुलन्दी और उच्चता प्रदान करता है और पस्ती और उसके भयंकर परिणामों से मुक्ति दिलाता है। इस्लाम इन्सान को सिद्ध पुरुष और भला मानव बनाता है। ख़ुदा ने जिन बुलन्दियों तक पहुँचने के लिए इन्सान को पैदा किया है, उन बुलन्दियों को पाने और उन तक ऊपर उठने की शक्ति और क्षमता इन्सान के अन्दर इस्लाम के द्वारा पैदा होती है।’’ इस्लाम की एक अन्य ख़ूबी यह है कि उसको जिसने भी अपनाया वह जात-पात के भेदभाव को भूल गया। मुदगुत्तूर (यह तमिलनाडु का एक गाँव है जहाँ ऊँची जात और नीची जात वालों के बीच भयानक दंगे हुए थे।) में एक-दूसरे की गर्दन मारने वाले जब इस्लाम ग्रहण करने लगे तो इस्लाम ने उनको भाई-भाई बना दिया। सारे भेदभाव समाप्त हो गए। नीची जाति के लोग नीचे नहीं रहे, बल्कि सबके सब प्रतिष्ठित और आदरणीय हो गए। सब समान अधिकारों के मालिक होकर बंधुत्व के बंधन में बंध गए। इस्लाम की इस ख़ूबी से मैं बहुत प्रभावित हुआ हूँ। बर्नाड शॉ, जो किसी मसले के सारे ही पहलुओं का गहराई के साथ जायज़ा लेने वाले व्यक्ति थे, उन्होंने इस्लाम के उसूलों का विश्लेषण करने के बाद कहा था: ‘‘दुनिया में बाक़ी और क़ायम रहने वाला दीन (धर्म) यदि कोई है तो वह केवल इस्लाम है।’’ आज 1957 ई॰ में जब हम मानव-चिंतन को जागृत करने और जनता को उनकी ख़ुदी से अवगत कराने की थोड़ी-बहुत कोशिश करते हैं तो कितना विरोध होता है। चौदह सौ साल पहले जब नबी (सल्ल॰) ने यह संदेश दिया कि बुतों को ख़ुदा न बनाओ। अनेक ख़ुदाओं को पूजने वालों के बीच खड़े होकर यह ऐलान किया कि बुत तुम्हारे ख़ुदा नहीं हैं। उनके आगे सिर मत झुकाओ। सिर्प़$ एक स्रष्टा ही की उपासना करो। इस ऐलान के लिए कितना साहस चाहिए था, इस संदेश का कितना विरोध हुआ होगा। विरोध के तूफ़ान के बीच पूरी दृढ़ता के साथ आप (सल्ल॰) यह क्रांतिकारी संदेश देते रहे, यह आप (सल्ल॰) की महानता का बहुत बड़ा सुबूत है। इस्लाम अपनी सारी ख़ूबियों और चमक-दमक के साथ हीरे की तरह आज भी मौजूद है। अब इस्लाम के अनुयायियों का यह कर्तव्य है कि वे इस्लाम धर्म को सच्चे रूप में अपनाएँ। इस तरह वे अपने रब की प्रसन्नता और ख़ुशी भी हासिल कर सकते हैं और ग़रीबों और मजबूरों की परेशानी भी हल कर सकते हैं। और मानवता भौतिकी एवं आध्यात्मिक विकास की ओर तीव्र गति से आगे बढ़ सकती है।’’ —
‘मुहम्मद (सल्ल॰) का जीवन-चरित्रा’ पर भाषण 7 अक्टूबर 1957 ई॰

प्रोफ़ेसर के॰ एस॰ रामाकृष्णा राव
(अध्यक्ष, दर्शन-शास्त्र विभाग, राजकीय कन्या विद्यालय मैसूर, कर्नाटक)
‘‘पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) की शिक्षाओं का ही यह व्यावहारिक गुण है, जिसने वैज्ञानिक प्रवृत्ति को जन्म दिया। इन्हीं शिक्षाओं ने नित्य के काम-काज और उन कामों को भी जो सांसारिक काम कहलाते हैं आदर और पवित्राता प्रदान की। क़ुरआन कहता है कि इन्सान को ख़ुदा की इबादत के लिए पैदा किया गया है, लेकिन ‘इबादत’ (पूजा) की उसकी अपनी अलग परिभाषा है। ख़ुदा की इबादत केवल पूजा-पाठ आदि तक सीमित नहीं, बल्कि हर वह कार्य जो अल्लाह के आदेशानुसार उसकी प्रसन्नता प्राप्त करने तथा मानव-जाति की भलाई के लिए किया जाए इबादत के अंतर्गत आता है। इस्लाम ने पूरे जीवन और उससे संबद्ध सारे मामलों को पावन एवं पवित्र घोषित किया है। शर्त यह है कि उसे ईमानदारी, न्याय और नेकनियती के साथ किया जाए। पवित्र और अपवित्र के बीच चले आ रहे अनुचित भेद को मिटा दिया। क़ुरआन कहता है कि अगर तुम पवित्र और स्वच्छ भोजन खाकर अल्लाह का आभार स्वीकार करो तो यह भी इबादत है। पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी को खाने का एक लुक़्मा खिलाता है तो यह भी नेकी और भलाई का काम है और अल्लाह के यहाँ वह इसका अच्छा बदला पाएगा। पैग़म्बर की एक और हदीस है—‘‘अगर कोई व्यक्ति अपनी कामना और ख़्वाहिश को पूरा करता है तो उसका भी उसे सवाब मिलेगा। शर्त यह है कि इसके लिए वही तरीक़ा अपनाए जो जायज़ हो।’’ एक साहब जो आपकी बातें सुन रहे थे, आश्चर्य से बोले, ‘‘हे अल्लाह के पैग़म्बर वह तो केवल अपनी इच्छाओं और अपने मन की कामनाओं को पूरा करता है। आपने उत्तर दिया, ‘यदि उसने अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए अवैध तरीक़ों और साधनों को अपनाया होता तो उसे इसकी सज़ा मिलती, तो फिर जायज़ तरीक़ा अपनाने पर उसे इनाम क्यों नहीं मिलना चाहिए? धर्म की इस नयी धारणा ने कि, ‘धर्म का विषय पूर्णतः अलौकिक जगत के मामलों तक सीमित न रहना चाहिए, बल्कि इसे लौकिक जीवन के उत्थान पर भी ध्यान देना चाहिए; नीति-शास्त्रा और आचार-शास्त्र के नए मूल्यों एवं मान्यताओं को नई दिशा दी। इसने दैनिक जीवन में लोगों के सामान्य आपसी संबंधों पर स्थाई प्रभाव डाला। इसने जनता के लिए गहरी शक्ति का काम किया, इसके अतिरिक्त लोगों के अधिकारों और कर्तव्यों की धारणाओं को सुव्यवस्थित करना और इसका अनपढ़ लोगों और बुद्धिमान दार्शनिकों के लिए समान रूप से ग्रहण करने और व्यवहार में लाने के योग्य होना पैग़म्बरे इस्लाम की शिक्षाओं की प्रमुख विशेषताएँ हैं। यहाँ यह बात सतर्कता के साथ दिमाग़ में आ जानी चाहिए कि भले कामों पर ज़ोर देने का अर्थ यह नहीं है कि इसके लिए धार्मिक आस्थाओं की पवित्रता एवं शुद्धता को कु़र्बान किया गया है। ऐसी बहुत-सी विचारधाराएँ हैं, जिनमें या तो व्यावहारिता के महत्व की बलि देकर आस्थाओं ही को सर्वोपरि माना गया है या फिर धर्म की शुद्ध धारणा एवं आस्था की परवाह न करके केवल कर्म को ही महत्व दिया गया है। इनके विपरीत इस्लाम सत्य आस्था एवं सतकर्म (के सामंजस्य) के नियम पर आधारित है। यहाँ साधन भी उतना ही महत्व रखते हैं जितना लक्ष्य। लक्ष्यों को भी वही महत्ता प्राप्त है जो साधनों को प्राप्त है। यह एक जैव इकाई की तरह है, इसके जीवन और विकास का रहस्य इनके आपस में जुड़े रहने में निहित है। अगर ये एक-दूसरे से अलग होते हैं तो ये क्षीण और विनष्ट होकर रहेंगे। इस्लाम में ईमान और अमल को अलग-अलग नहीं किया जा सकता। सत्य ज्ञान को सत्कर्म में ढल जाना चाहिए। ताकि अच्छे फल प्राप्त हो सवें$। ‘जो लोग ईमान रखते हैं और नेक अमल करते हैं, केवल वे ही स्वर्ग में जा सकेंगे’ यह बात क़ुरआन में कितनी ही बार दोहराई गयी है। इस बात को पचास बार से कम नहीं दोहराया गया है। सोच-विचार और ध्यान पर उभारा अवश्य गया है, लेकिन मात्र ध्यान और सोच-विचार ही लक्ष्य नहीं है। जो लोग केवल ईमान रखें, लेकिन उसके अनुसार कर्म न करें उनका इस्लाम में कोई मक़ाम नहीं है। जो ईमान तो रखें लेकिन कुकर्म भी करें उनका ईमान क्षीण है। ईश्वरीय क़ानून मात्र विचार-पद्धति नहीं, बल्कि वह एक कर्म और प्रयास का क़ानून है। यह दीन (धर्म) लोगों के लिए ज्ञान से कर्म और कर्म से परितोष द्वारा स्थाई एवं शाश्वत उन्नति का मार्ग दिखलाता है। लेकिन वह सच्चा ईमान क्या है, जिससे सत्कर्म का आविर्भाव होता है, जिसके फलस्वरूप पूर्ण परितोष प्राप्त होता है? इस्लाम का बुनियादी सिद्धांत ऐकेश्वरवाद है ‘अल्लाह बस एक ही है, उसके अतिरिक्त कोई इलाह नहीं’ इस्लाम का मूल मंत्र है। इस्लाम की तमाम शिक्षाएँ और कर्म इसी से जुड़े हुए हैं। वह केवल अपने अलौकिक व्यक्तित्व के कारण ही अद्वितीय नहीं, बल्कि अपने दिव्य एवं अलौकिक गुणों एवं क्षमताओं की दृष्टि से भी अनन्य और बेजोड़ है।’’ —
‘मुहम्मद, इस्लाम के पैग़म्बर’ मधुर संदेश संगम, नई दिल्ली, 1990


वेनगताचिल्लम अडियार
जन्म: 16, मई 1938 ● वरिष्ठ तमिल लेखक; न्यूज़ एडीटर: दैनिक ‘मुरासोली’
● तमिलनाडु के 3 मुख्यमंत्रियों के सहायक ● कलाइममानी अवार्ड (विग जेम ऑफ आर्ट्स) तमिलनाडु सरकार; पुरस्कृत 1982 ● 120 उपन्यासों, 13 पुस्तकों, 13 ड्रामों के लेखक ● संस्थापक, पत्रिका ‘नेरोत्तम’ ‘
‘औरत के अधिकारों से अनभिज्ञ अरब समाज में प्यारे नबी (सल्ल॰) ने औरत को मर्द के बराबर दर्जा दिया। औरत का जायदाद और सम्पत्ति में कोई हक़ न था, आप (सल्ल॰) ने विरासत में उसका हक़ नियत किया। औरत के हक़ और अधिकार बताने के लिए क़ुरआन में निर्देश उतारे गए। माँ-बाप और अन्य रिश्तेदारों की जायदाद में औरतों को भी वारिस घोषित किया गया। आज सभ्यता का राग अलापने वाले कई देशों में औरत को न जायदाद का हक़ है न वोट देने का। इंग्लिस्तान में औरत को वोट का अधिकार 1928 ई॰ में पहली बार दिया गया। भारतीय समाज में औरत को जायदाद का हक़ पिछले दिनों में हासिल हुआ। लेकिन हम देखते हैं कि आज से चौदह सौ वर्ष पूर्व ही ये सारे हक़ और अधिकार नबी (सल्ल॰) ने औरतों को प्रदान किए। कितने बड़े उपकारकर्ता हैं आप। आप (सल्ल॰) की शिक्षाओं में औरतों के हक़ पर काफ़ी ज़ोर दिया गया है। आप (सल्ल॰) ने ताकीद की कि लोग कर्तव्य से ग़ाफ़िल न हों और न्यायसंगत रूप से औरतों के हक़ अदा करते रहें। आप (सल्ल॰) ने यह भी नसीहत की है कि औरत को मारा-पीटा न जाए। औरत के साथ कैसा बर्ताव किया जाए, इस संबंध में नबी (सल्ल॰) की बातों का अवलोकन कीजिए: 1. अपनी पत्नी को मारने वाला अच्छे आचरण का नहीं है। 2. तुममें से सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति वह है जो अपनी पत्नी से अच्छा सुलूक करे। 3. औरतों के साथ अच्छे तरीक़े से पेश आने का ख़ुदा हुक्म देता है, क्योंकि वे तुम्हारी माँ, बहन और बेटियाँ हैं। 4. माँ के क़दमों के नीचे जन्नत है। 5. कोई मुसलमान अपनी पत्नी से नफ़रत न करे। अगर उसकी कोई एक आदत बुरी है तो उसकी दूसरी अच्छी आदत को देखकर मर्द को ख़ुश होना चाहिए। 6. अपनी पत्नी के साथ दासी जैसा व्यवहार न करो। उसको मारो भी मत। 7. जब तुम खाओ तो अपनी पत्नी को भी खिलाओ। जब तुम पहनो तो अपनी पत्नी को भी पहनाओ। 8. पत्नी को ताने मत दो। चेहरे पर न मारो। उसका दिल न दुखाओ। उसको छोड़कर न चले जाओ। 9. पत्नी अपने पति के स्थान पर समस्त अधिकारों की मालिक है। 10. अपनी पत्नियों के साथ जो अच्छी तरह बर्ताव करेंगे, वही तुम में सबसे बेहतर हैं। मर्द को किसी भी समय अपनी काम-तृष्णा की ज़रूरत पेश आ सकती है। इसलिए कि उसे क़ुदरत ने हर हाल में हमेशा सहवास के योग्य बनाया है जबकि औरत का मामला इससे भिन्न है। माहवारी के दिनों में, गर्भावस्था में (नौ-दस माह), प्रसव के बाद के कुछ माह औरत इस योग्य नहीं होती कि उसके साथ उसका पति संभोग कर सके। सारे ही मर्दों से यह आशा सही न होगी कि वे बहुत ही संयम और नियंत्रण से काम लेंगे और जब तक उनकी पत्नियाँ इस योग्य नहीं हो जातीं कि वे उनके पास जाएँ, वे काम इच्छा को नियंत्रित रखेंगे। मर्द जायज़ तरीक़े से अपनी ज़रूरत पूरी कर सके, ज़रूरी है कि इसके लिए राहें खोली जाएँ और ऐसी तंगी न रखी जाए कि वह हराम रास्तों पर चलने पर विवश हो। पत्नी तो उसकी एक हो, आशना औरतों की कोई क़ैद न रहे। इससे समाज में जो गन्दगी फैलेगी और जिस तरह आचरण और चरित्रा ख़राब होंगे इसका अनुमान लगाना आपके लिए कुछ मुश्किल नहीं है। व्यभिचार और बदकारी को हराम ठहराकर बहुस्त्रीवाद की क़ानूनी इजाज़त देने वाला बुद्धिसंगत दीन इस्लाम है। एक से अधिक शादियों की मर्यादित रूप में अनुमति देकर वास्तव में इस्लाम ने मर्द और औरत की शारीरिक संरचना, उनकी मानसिक स्थितियों और व्यावहारिक आवश्यकताओं का पूरा ध्यान रखा है और इस तरह हमारी दृष्टि में इस्लाम बिल्कुल एक वैज्ञानिक धर्म साबित होता है। यह एक हक़ीक़त है, जिस पर मेरा दृढ़ और अटल विश्वास है। इतिहास में हमें कोई ऐसी घटना नहीं मिलती कि अगर किसी ने इस्लाम क़बूल करने से इन्कार किया तो उसे केवल इस्लाम क़बूल न करने के जुर्म में क़त्ल कर दिया गया हो, लेकिन कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट के बीच संघर्ष में धर्म की बुनियाद पर बड़े पैमाने पर ख़ून-ख़राबा हुआ। दूर क्यों जाइए, तमिलनाउु के इतिहास ही को देखिए, मदुरै में ज्ञान समुन्द्र के काल में आठ हज़ार समनर मत के अनुयायियों को सूली दी गई, यह हमारा इतिहास है। अरब में प्यारे नबी (सल्ल॰) शासक थे तो वहाँ यहूदी भी आबाद थे और ईसाई भी, लेकिन आप (सल्ल॰) ने उन पर कोई ज़्यादती नहीं की। हिन्दुस्तान में मुस्लिम शासकों के ज़माने में हिन्दू धर्म को अपनाने और उस पर चलने की पूर्ण अनुमति थी। इतिहास गवाह है कि इन शासकों ने मन्दिरों की रक्षा और उनकी देखभाल की है। मुस्लिम फ़ौजकशी अगर इस्लाम को फैलाने के लिए होती तो दिल्ली के मुस्लिम सुल्तान के ख़िलाफ़ मुसलमान बाबर हरगिज़ फ़ौजकशी न करता। मुल्कगीरी उस समय की सर्वमान्य राजनीति थी। मुल्कगीरी का कोई संबंध धर्म के प्रचार से नहीं होता। बहुत सारे मुस्लिम उलमा और सूफ़ी इस्लाम के प्रचार के लिए हिन्दुस्तान आए हैं और उन्होंने अपने तौर पर इस्लाम के प्रचार का काम यहाँ अंजाम दिया, उसका मुस्लिम शासकों से कोई संबंध न था, इसके सबूत में नागोर में दफ़्न हज़रत शाहुल हमीद, अजमेर के शाह मुईनुद्दीन चिश्ती वग़ैरह को पेश किया जा सकता है। इस्लाम अपने उसूलों और अपनी नैतिक शिक्षाओं की दृष्टि से अपने अन्दर बड़ी कशिश रखता है, यही वजह है कि इन्सानों के दिल उसकी तरफ़ स्वतः खिंचे चले आते हैं। फिर ऐसे दीन को अपने प्रचार के लिए तलवार उठाने की आवश्यकता ही कहाँ शेष रहती है? श्री वेनगाताचिल्लम अडियार ने बाद में (6 जून 1987 को) इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था। और ‘अब्दुल्लाह अडियार’ नाम रख लिया था। श्री अडियार से प्रभावित होकर जिन लोगों ने इस्लाम धर्म स्वीकार किया उनमें उल्लेखनीय विभूतियाँ हैं : 1) श्री कोडिक्कल चेलप्पा, भूतपूर्व ज़िला सचिव, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (अब ‘कोडिक्कल शेख़ अब्दुल्लाह’) 2) वीरभद्रनम, डॉ॰ अम्बेडकर के सहपाठी (अब ‘मुहम्मद बिलाल’) 3) स्वामी आनन्द भिक्खू—बौद्ध भिक्षु (अब ‘मुजीबुल्लाह’) श्री अब्दुल्लाह अडियार के पिता वन्कटचिल्लम और उनके दो बेटों ने भी इस्लाम स्वीकार कर लिया था। —
‘इस्लाम माय फ़सिनेशन’ एम॰एम॰आई॰ पब्लिकेशंस, नई दिल्ली, 2007


विशम्भर नाथ पाण्डे
भूतपूर्व राज्यपाल, उड़ीसा
क़ुरआन ने मनुष्य के आध्यात्मिक, आर्थिक और राजकाजी जीवन को जिन मौलिक सिद्धांतों पर क़ायम करना चाहा है उनमें लोकतंत्र को बहुत ऊँची जग हदी गई है और समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व-भावना के स्वर्णिम सिद्धांतों को मानव जीवन की बुनियाद ठहराया गया है। क़ुरआन ‘‘तौहीद’’ यानी एकेश्वरवाद को दुनिया की सबसे बड़ी सच्चाई बताता है। वह आदमी की ज़िन्दगी के हर पहलू की बुनियाद इसी सच्चाई पर क़ायम करता है। क़ुरआन का कहना है कि जब कुल सृष्टि का ईश्वर एक है तो लाज़मी तौर पर कुल मानव समाज भी उसी ईश्वर की एकता का एक रूप है। आदमी अपनी बुद्धि और अपनी आध्यात्मिक शक्तियों से इस सच्चाई को अच्छी तरह समझ सकता इै। इसलिए आदमी का सबसे पहला कर्तव्य यह है कि ईश्वर की एकता को अपने धर्म-ईमान की बुनियाद बनाए और अपने उस मालिक के सामने, जिसने उसे पैदा किया और दुनिया की नेमतें दीं, सर झुकाए। आदमी की रूहानी ज़िन्दगी का यही सबसे पहला उसूल है। एकेश्वरवाद के सिद्धांत पर ही आधारित क़ुरआन ने दो तरह के कर्तव्य हर आदमी के सामने रखे हैं—एक, जिन्हें वह ‘हक़ूक़-अल्लाह’ अर्थात ईश्वर के प्रति मनुष्य के कर्तव्य कहता है और दूसरे, जिन्हें वह ‘हक़ूक़-उल-अबाद’ अर्थात मानव के प्रति-मानव के कर्तव्य। हक़ू$क़-अल्लाह में नमाज़, रोज़ा, हज, ज़कात, आख़रत और देवदूतों (फ़रिश्तों) पर विश्वास जैसी बातें शामिल हैं, जिन्हें हर व्यक्ति देश काल के अनुसार अपने ढंग से पूरा कर सकता है। क़ुरआन ने इन्हें इन्सान के लिए फ़र्ज़ बताया है इसे ही वास्तविक इबादत (ईश्वर पूजा) कहा है। इन कर्तव्यों के पूरा करने से आदमी में रूहानी शक्ति आती है। ‘हक़ू$क़-अल्लाह’ के साथ ही क़ुरआन ने हक़ू$क़-उल-अबाद’ अर्थात मानव के प्रति मानव के कर्तव्य पर भी ज़ोर दिया है और साफ़ कहा है कि अगर हक़ूक़-अल्लाह के पूरा करने में किसी तरह की कमी रह जाए तो ख़ुदा माफ़ कर सकता है, लेकिन अगर हक़ूक़-उल-अबाद के पूरा करने में ज़र्रा बराबर की कमी रह जाए तो ख़ुदा उसे हरगिज़ माफ़ न करेगा। ऐसे आदमी को इस दुनिया और दूसरी दुनिया, दोनों में, ख़िसारा अर्थात् घाटा उठाना होगा। क़ुरआन का यह पहला बुनियादी उसूल हुआ। क़ुरआन का दूसरा उसूल यह है कि हक़ूक़-अल्लाह यानी नमाज़ रोज़ा, ज़कात और हज आदमी के आध्यात्मिक (रूहानी) जीवन और आत्मिक जीवन (Spiritual Life) से संबंध रखते हैं। इसलिए इन्हें ईमान (श्रद्धा), ख़ुलूसे क़ल्ब (शुद्ध हृदय) और बेग़रज़ी (निस्वार्थ भावना) के साथ पूरा करना चाहिए, यानी इनके पूरा करने में अपने लिए कोई निजी या दुनियावी फ़ायदा, ...निगाह में नहीं होनी चाहिए। यह केवल अल्लाह के निकट जाने के लिए और रूहानी शक्ति हासिल करने के लिए हैं ताकि आदमी दीन-धर्म की सीधी राह पर चल सके। अगर इनमें कोई भी स्वार्थ या ख़ुदग़रज़ी आएगी तो इनका वास्तविक उद्देश्य जाता रहेगा और यह व्यर्थ हो जाएँगे। आदमी की समाजी ज़िन्दगी का पहला फ़र्ज़ क़ुरआन में ग़रीबों, लाचारों, दुखियों और पीड़ितों से सहानुभूति और उनकी सहायता करना बताया गया है। क़ुरआन ने इन्सान के समाजी जीवन की बुनियाद ईश्वर की एकता और इन्सानी भाईचारे पर रखी है। क़ुरआन की सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि वह इन्सानियत के, मानवता के, टुकड़े नहीं करता। इस्लाम के इन्सानी भाईचारे की परिधि में कुल मानवजाति, कुल इन्सान शामिल हैं और हर व्यक्ति को सदा सबकी अर्थात् आखिल मानवता की भलाई, बेहतरी और कल्याण का ध्येय अपने सामने रखना चाहिए। क़ुरआन का कहना है कि सारा मानव समाज एक कुटुम्ब है। क़ुरआन की कई आयतों में नबियों और पैग़म्बरों को भी भाई शब्द से संबोधित किया गया है। मुहम्मद साहब हर समय की नमाज़ के बाद आमतौर पर यह कहा करते थे—‘‘मैं साक्षी हूँ कि दुनिया के सब आदमी एक-दूसरे के भाई हैं।’’ यह शब्द इतनी गहराई और भावुकता के साथ उनके गले से निकलते थे कि उनकी आँखों से टप-टप आंसू गिरने लगते थे। इससे अधिक स्पष्ट और ज़ोरदार शब्दों में मानव-एकता और मानवजाति के एक कुटुम्ब होने का बयान नहीं किया जा सकता। कु़रआन की यह तालीम और इस्लाम के पैग़म्बर की यह मिसाल उन सारे रिवाजों और क़ायदे-क़ानूनों और उन सब क़ौमी, मुल्की, और नसली...गिरोहबन्दियों को एकदम ग़लत और नाजायज़ कर देती है जो एक इन्सान को दूसरे इन्सान से अलग करती हैं और मानव-मानव के बीच भेदभाव और झगड़े पैदा करती हैं। —
‘पैग़म्बर मुहम्मद, कु़रआन और हदीस, इस्लामी दर्शन’ गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति, नई दिल्ली, 1994


तरुण विजय
सम्पादक, हिन्दी साप्ताहिक ‘पाञ्चजन्य’ (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पत्रिका)
‘‘...क्या इससे इन्कार मुम्किन है कि पैग़म्बर मुहम्मद एक ऐसी जीवन-पद्धति बनाने और सुनियोजित करने वाली महान विभूति थे जिसे इस संसार ने पहले कभी नहीं देखा? उन्होंने इतिहास की काया पलट दी और हमारे विश्व के हर क्षेत्र पर प्रभाव डाला। अतः अगर मैं कहूँ कि इस्लाम बुरा है तो इसका मतलब यह हुआ कि दुनिया भर में रहने वाले इस धर्म के अरबों (Billions) अनुयायियों के पास इतनी बुद्धि-विवेक नहीं है कि वे जिस धर्म के लिए जीते-मरते हैं उसी का विश्लेषण और उसकी रूपरेखा का अनुभव कर सवें$। इस धर्म के अनुयायियों ने मानव-जीवन के लगभग सारे क्षेत्रों में बड़ा नाम कमाया और हर किसी से उन्हें सम्मान मिला...।’’ ‘‘हम उन (मुसलमानों) की किताबों का, या पैग़म्बर के जीवन-वृत्तांत का, या उनके विकास व उन्नति के इतिहास का अध्ययन कम ही करते हैं... हममें से कितनों ने तवज्जोह के साथ उस परिस्थिति पर विचार किया है जो मुहम्मद के, पैग़म्बर बनने के समय, 14 शताब्दियों पहले विद्यमान थे और जिनका बेमिसाल, प्रबल मुक़ाबला उन्होंने किया? जिस प्रकार से एक अकेले व्यक्ति के दृढ़ आत्म-बल तथा आयोजन-क्षमता ने हमारी ज़िन्दगियों को प्रभावित किया और समाज में उससे एक निर्णायक परिवर्तन आ गया, वह असाधारण था। फिर भी इसकी गतिशीलता के प्रति हमारा जो अज्ञान है वह हमारे लिए एक ऐसे मूर्खता के सिवाय और कुछ नहीं है जिसे माफ़ नहीं किया जा सकता।’’ ‘‘पैग़म्बर मुहम्मद ने अपने बचपन से ही बड़ी कठिनाइयाँ झेलीं। उनके पिता की मृत्यु, उनके जन्म से पहले ही हो गई और माता की भी, जबकि वह सिर्प़$ छः वर्ष के थे। लेकिन वह बहुत ही बुद्धिमान थे और अक्सर लोग आपसी झगड़े उन्हीं के द्वारा सुलझवाया करते थे। उन्होंने परस्पर युद्धरत क़बीलों के बीच शान्ति स्थापित की और सारे क़बीलों में ‘अल-अमीन’ (विश्वसनीय) कहलाए जाने का सम्मान प्राप्त किया जबकि उनकी आयु मात्रा 35 वर्ष थी। इस्लाम का मूल-अर्थ ‘शान्ति’ था...। शीघ्र ही ऐसे अनेक व्यक्तियों ने इस्लाम ग्रहण कर लिया, उनमें ज़ैद जैसे गु़लाम (Slave) भी थे, जो सामाजिक न्याय से वंचित थे। मुहम्मद के ख़िलाफ़ तलवारों का निकल आना कुछ आश्चर्यजनक न था, जिसने उन्हें (जन्म-भूमि ‘मक्का’ से) मदीना प्रस्थान करने पर विवश कर दिया और उन्हें जल्द ही 900 की सेना का, जिसमें 700 ऊँट और 300 घोड़े थे मुक़ाबला करना पड़ा। 17 रमज़ान, शुक्रवार के दिन उन्होंने (शत्रु-सेना से) अपने 300 अनुयायियों और 4 घोड़ों (की सेना) के साथ बद्र की लड़ाई लड़ी। बाक़ी वृत्तांत इतिहास का हिस्सा है। शहादत, विजय, अल्लाह की मदद और (अपने) धर्म में अडिग विश्वास!’’ —
आलेख (‘Know thy neighbor, it’s Ramzan’ अंग्रेज़ी दैनिक ‘एशियन एज’, 17 नवम्बर 2003 से उद्धृत

एम॰ एन॰ रॉय संस्थापक-कम्युनिस्ट पार्टी, मैक्सिको कम्युनिस्ट पार्टी, भारत
‘‘इस्लाम के एकेश्वरवाद के प्रति अरब के बद्दुओं के दृढ़ विश्वास ने न केवल क़बीलों के बुतों को ध्वस्त कर दिया बल्कि वे इतिहास में एक ऐसी अजेय शक्ति बनकर उभरे जिसने मानवता को बुतपरस्ती की लानत से छुटकारा दिलाया। ईसाइयों के, संन्यास और चमत्कारों पर भरोसा करने की घातक प्रवृत्ति को झिकझोड़ कर रख दिया और पादरियों और हवारियों (मसीह के साथियों) के पूजा की कुप्रथा से भी छुटकारा दिला दिया।’’ ‘‘सामाजिक बिखराव और आध्यात्मिक बेचैनी के घोर अंधकार वाले वातावरण में अरब के पैग़म्बर की आशावान एवं सशक्त घोषणा आशा की एक प्रज्वलित किरण बनकर उभरी। लाखों लोगों का मन उस नये धर्म की सांसारिक एवं पारलौकिक सफलता की ओर आकर्षित हुआ। इस्लाम के विजयी बिगुल ने सोई हुई निराश ज़िन्दगियों को जगा दिया। मानव-प्रवृ$ति के स्वस्थ रुझान ने उन लोगों में भी हिम्मत पैदा की जो ईसा के प्रतिष्ठित साथियों के पतनशील होने के बाद संसार-विमुखता के अंधविश्वासी कल्पना के शिकार हो चुके थे। वे लोग इस नई आस्था से जुड़ाव महसूस करने लगे। इस्लाम ने उन लोगों को जो अपमान के गढ़े में पड़े हुए थे एक नई सोच प्रदान की। इसलिए जो उथल-पुथल पैदा हुई उससे एक नए समाज का गठन हुआ जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को यह अवसर उपलब्ध था कि वह अपनी स्वाभाविक क्षमताओं के अनुसार आगे बढ़ सके और तरक़्क़ी कर सके। इस्लाम की जोशीली तहरीक और मुस्लिम विजयताओं के उदार रवैयों ने उत्तरी अफ़्रीक़ा की उपजाऊ भूमि में लोगों के कठिन परिश्रम के कारण जल्द ही हरियाली छा गई और लोगों की ख़ुशहाली वापस आ गई...।’’ ‘‘...ईसाइयत के पतन ने एक नये शक्तिशाली धर्म के उदय को ऐतिहासिक ज़रूरत बना दिया था। इस्लाम ने अपने अनुयायियों को एक सुन्दर स्वर्ग की कल्पना ही नहीं दी बल्कि उसने दुनिया को पराजित करने का आह्वान भी किया। इस्लाम ने बताया कि जन्नत की ख़ुशियों भरी ज़िन्दगी इस दुनिया में भी संभव हैं। मुहम्मद ने अपने लोगों को क़ौमी एकता के धागे में ही नहीं पिरोया बल्कि पूरी क़ौम के अन्दर वह भाव और जोश पैदा किया कि वे हर जगह इन्क़िलाब का नारा बुलन्द करे जिसे सुनकर पड़ोसी देशों के शोषित/पीड़ित लोगों ने भी इस्लाम का आगे बढ़कर स्वागत किया। इस्लाम की इस नाटकीय सफलता का कारण आध्यात्मिक भी था, सामाजिक भी था और राजनीतिक भी। इसी बात पर ज़ोर देते हुए गिबन कहता है: ज़रतुश्त की व्यवस्था से अधिक स्वच्छ एवं पारदर्शी और मूसा के क़ानूनों से कहीं अधिक लचीला मुहम्मद का यह धर्म, बुद्धि एवं विवेक से अधिक निकट है। अंधविश्वास और पहेली से इसकी तुलना नहीं की जा सकती जिसने सातवीं शताब्दी में मूसा की शिक्षाओं को बदनुमा बना दिया था...।’’ ‘‘...हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) का धर्म एकेश्वरवाद पर आधारित है और एकेश्वरवाद की आस्था ही उसकी ठोस बुनियाद भी है। इसमें किसी प्रकार के छूट की गुंजाइश नहीं और अपनी इसी विशेषता के कारण वह धर्म का सबसे श्रेष्ठ पैमाना भी बना। दार्शनिक दृष्टिकोण से भी एकेश्वरवाद की कल्पना ही इस धर्म की बुनियाद है। लेकिन एकेश्वरवाद की यह कल्पना भी अनेक प्रकार के अंधविश्वास को जन्म दे सकती है यदि यह दृष्टिकोण सामने न हो कि अल्लाह ने सृष्टि की रचना की है और इस सृष्टि से पहले कुछ नहीं था। प्राचीन दार्शनिक, चाहे वे यूनान के हों या भारत के, उनके यहां सृष्टि की रचना की यह कल्पना नहीं मिलती। यही कारण है कि जो धर्म उस प्राचीन दार्शनिक सोच से प्रभावित थे वे एकेश्वरवाद का नज़रिया क़ायम नहीं कर सके। जिसकी वजह से सभी बड़े-बड़े धर्म, चाहे वह हिन्दू धर्म हो, यहूदियत हो या ईसाइयत, धीरे-धीरे कई ख़ुदाओं को मानने लगे। यही कारण है कि वे सभी धर्म अपनी महानता खो बैठे। क्योंकि कई ख़ुदाओं की कल्पना सृष्टि को ख़ुदा के साथ सम्मिलित कर देती है जिससे ख़ुदा की कल्पना पर ही प्रश्न चिन्ह लग जाता है। इससे पैदा करने की कल्पना ही समाप्त हो जाती है, इसलिए ख़ुदा की कल्पना भी समाप्त हो जाती है। यदि यह दुनिया अपने आप स्थापित हो सकती है तो यह ज़रूरी नहीं कि उसका कोई रचयिता भी हो और जब उसके अन्दर से पैदा करने की क्षमता समाप्त हो जाती है तो फिर ख़ुदा की भी आवश्यकता नहीं रहती। मुहम्मद का धर्म इस कठिनाई को आसानी से हल कर लेता है। यह ख़ुदा की कल्पना को आरंभिक बुद्धिवादियों की कठिनाइयों से आज़ाद करके यह दावा करता है कि अल्लाह ने ही सृष्टि की रचना की है। इस रचना से पहले कुछ नहीं था। अब अल्लाह अपनी पूरी शान और प्रतिष्ठा के साथ विराजमान हो जाता है। उसके अन्दर इस चीज़ की क्षमता एवं शक्ति है कि न केवल यह कि वह इस सृष्टि की रचना कर सकता है बल्कि अनेक सृष्टि की रचना करने की क्षमता रखता है। यह उसके शक्तिशाली और हैयुल क़ैयूम होने की दलील है। ख़ुदा को इस तरह स्थापित करने और स्थायित्व प्रदान करने की कल्पना ही मुहम्मद कारनामा है। अपने इस कारनामे के कारण ही इतिहास ने उन्हें सबसे स्वच्छ एवं पाक धर्म की बुनियाद रखने वाला मानता है। क्योंकि दूसरे सभी धर्म अपने समस्त भौतिक/प्राभौतिक कल्पनाओं, धार्मिक बारीकियों और दार्शनिक तर्कों/कुतर्कों के कारण न केवल त्रुटिपूर्ण धर्म हैं बल्कि केवल नाम के धर्म हैं...।’’ ‘‘...यह बात तो बिल्कुल स्पष्ट है कि भारत में मुसलमानों की विजय के समय ऐसे लाखों लोग यहां मौजूद थे जिनके नज़दीक हिन्दू क़ानूनों के प्रति व़फादार रहने का कोई औचित्य नहीं था। और ब्राह्मणों की कट्टर धार्मिकता एवं परम्पराओं की रक्षा उनके नज़दीक निरर्थक थे। ऐसे सभी लोग अपनी हिन्दू विरासत को इस्लाम के समानता के क़ानून के लिए त्यागने को तैयार थे जो उन्हें हर प्रकार की सुरक्षा भी उपलब्ध करा रहा था ताकि वे कट्टर हिन्दुत्ववादियों के अत्याचार से छुटकारा हासिल कर सवें$। फिर भी हैवेल (Havel) इस बात से संतुष्ट नहीं था। हार कर उसने कहा: ‘‘यह इस्लाम का दर्शनशास्त्र नहीं था बल्कि उसकी सामाजिक योजना थी जिसके कारण लाखों लोगों ने इस धर्म को स्वीकार कर लिया। यह बात बिल्कुल सही है कि आम लोग दर्शन से प्रभावित नहीं होते। वे सामाजिक योजनाओं से अधिक प्रभावित होते हैं जो उन्हें मौजूदा ज़िन्दगी से बेहतर ज़िन्दगी की ज़मानत दे रहा था। इस्लाम ने जीवन की ऐसी व्यवस्था दी जो करोड़ों लोगों की ख़ुशी की वजह बना।’’ ‘‘....ईरानी और मुग़ल विजेयताओं के अन्दर वह पारम्परिक उदारता और आज़ादपसन्दी मिलती है जो आरंभिक मुसलमानों की विशेषता थी। केवल यह सच्चाई कि दूर-दराज़ के मुट्ठी भर हमलावर इतने बड़े देश का इतनी लंबी अवधि तक शासक बने रहे और उनके अक़ीदे को लाखों लोगों ने अपनाकर अपना धर्म परिवर्तन कर लिया, यह साबित करने के लिए काफ़ी है कि वे भारतीय समाज की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा कर रहे थे। भारत में मुस्लिम शक्ति केवल कुछ हमलावरों की बहादुरी के कारण संगठित नहीं हुई थी बल्कि इस्लामी क़ानून के विकासमुखी महत्व और उसके प्रचार के कारण हुई थी। ऐसा हैवेल जैसा मुस्लिम विरोधी इतिहासकार भी मानता है। मुसलमानों की राजनैतिक व्यवस्था का हिन्दू सामाजिक जीवन पर दो तरह का प्रभाव पड़ा। इससे जाति-पाति के शिवं$जे और मज़बूत हुए जिसके कारण उसके विरुद्ध बग़ावत शुरू हो गई। साथ ही निचली और कमज़ोर जातियों के लिए बेहतर जीवन और भविष्य की ज़मानत उन्हें अपना धर्म छोड़कर नया धर्म अपनाने के लिए मजबूर करती रही। इसी की वजह से शूद्र न केवल आज़ाद हुए बल्कि कुछ मामलों में वे ब्राह्मणों के मालिक भी बन गए।’’ —‘हिस्टोरिकल रोल ऑफ इस्लाम ऐन एस्से ऑन इस्लामिक कल्चर’ क्रिटिकल क्वेस्ट पब्लिकेशन कलकत्ता-1939 से उद्धृत

राजेन्द्र नारायण लाल
(एम॰ ए॰ (इतिहास) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय)
‘‘...संसार के सब धर्मों में इस्लाम की एक विशेषता यह भी है कि इसके विरुद्ध जितना भ्रष्ट प्रचार हुआ किसी अन्य धर्म के विरुद्ध नहीं हुआ । सबसे पहले तो महाईशदूत मुहम्मद साहब की जाति कु़रैश ही ने इस्लाम का विरोध किया और अन्य कई साधनों के साथ भ्रष्ट प्रचार और अत्याचार का साधन अपनाया। यह भी इस्लाम की एक विशेषता ही है कि उसके विरुद्ध जितना प्रचार हुआ वह उतना ही फैलता और उन्नति करता गया तथा यह भी प्रमाण है—इस्लाम के ईश्वरीय सत्य-धर्म होने का। इस्लाम के विरुद्ध जितने प्रकार के प्रचार किए गए हैं और किए जाते हैं उनमें सबसे उग्र यह है कि इस्लाम तलवार के ज़ोर से फैला, यदि ऐसा नहीं है तो संसार में अनेक धर्मों के होते हुए इस्लाम चमत्कारी रूप से संसार में कैसे फैल गया? इस प्रश्न या शंका का संक्षिप्त उत्तर तो यह है कि जिस काल में इस्लाम का उदय हुआ उन धर्मों के आचरणहीन अनुयायियों ने धर्म को भी भ्रष्ट कर दिया था। अतः मानव कल्याण हेतु ईश्वर की इच्छा द्वारा इस्लाम सफल हुआ और संसार में फैला, इसका साक्षी इतिहास है...।’’ ‘‘...इस्लाम को तलवार की शक्ति से प्रसारित होना बताने वाले (लोग) इस तथ्य से अवगत होंगे कि अरब मुसलमानों के ग़ैर-मुस्लिम विजेता तातारियों ने विजय के बाद विजित अरबों का इस्लाम धर्म स्वयं ही स्वीकार कर लिया। ऐसी विचित्र घटना कैसे घट गई? तलवार की शक्ति जो विजेताओं के पास थी वह इस्लाम से विजित क्यों हो गई...?’’ ‘‘...मुसलमानों का अस्तित्व भारत के लिए वरदान ही सिद्ध हुआ। उत्तर और दक्षिण भारत की एकता का श्रेय मुस्लिम साम्राज्य, और केवल मुस्लिम साम्राज्य को ही प्राप्त है। मुसलमानों का समतावाद भी हिन्दुओं को प्रभावित किए बिना नहीं रहा। अधिकतर हिन्दू सुधारक जैसे रामानुज, रामानन्द, नानक, चैतन्य आदि मुस्लिम-भारत की ही देन है। भक्ति आन्दोलन जिसने कट्टरता को बहुत कुछ नियंत्रित किया, सिख धर्म और आर्य समाज जो एकेश्वरवादी और समतावादी हैं, इस्लाम ही के प्रभाव का परिणाम हैं। समता संबंधी और सामाजिक सुधार संबंधी सरकरी क़ानून जैसे अनिवार्य परिस्थिति में तलाक़ और पत्नी और पुत्री का सम्पत्ति में अधिकतर आदि इस्लाम प्रेरित ही हैं...।
’’ —‘इस्लाम एक स्वयंसिद्ध ईश्वरीय जीवन व्यवस्था’ पृष्ठ 40,42,52 से उद्धृत साहित्य सौरभ, नई दिल्ली, 2007 ई॰

लाला काशी राम चावला
‘‘...न्याय ईश्वर के सबसे बड़े गुणों में से एक अतिआवश्यक गुण है। ईश्वर के न्याय से ही संसार का यह सारा कार्यालय चल रहा है। उसका न्याय सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के कण-कण में काम कर रहा है। न्याय का शब्दिक अर्थ है एक वस्तु के दो बराबर-बराबर भाग, जो तराज़ू में रखने से एक समान उतरें, उनमें रत्ती भर फ़र्व़$ न हो और व्यावहारतः हम इसका मतलब यह लेते हैं कि जो बात कही जाए या जो काम किया जाए वह सच्चाई पर आधारित हो, उनमें तनिक भी पक्षपात या किसी प्रकार की असमानता न हो...।’’ ‘‘...इस्लाम में न्याय को बहुत महत्व दिया गया है और कु़रआन में जगह-जगह मनुष्य को न्याय करने के आदेश मौजूद हैं। इसमें जहाँ गुण संबंधी ईश्वर के विभिन्न नाम आए हैं, वहाँ एक नाम आदिल अर्थात् न्यायकर्ता भी आया है। ईश्वर चूँकि स्वयं न्यायकर्ता है, वह अपने बन्दों से भी न्याय की आशा रखता है। पवित्र क़ुरआन में है कि ईश्वर न्याय की ही बात कहता है और हर बात का निर्णय न्याय के साथ ही करता है...।’’ ‘‘...इस्लाम में पड़ोसी के साथ अच्छे व्यवहार पर बड़ा बल दिया गया है। परन्तु इसका उद्देश्य यह नहीं है कि पड़ोसी की सहायता करने से पड़ोसी भी समय पर काम आए, अपितु इसे एक मानवीय कर्तव्य ठहराया गया है, इसे आवश्यक क़रार दिया गया है और यह कर्तव्य पड़ोसी ही तक सीमित नहीं है बल्कि किसी साधारण मनुष्य से भी असम्मानजनक व्यवहार न करने की ताकीद की गई है...।’’ ‘‘...निस्सन्देह अन्य धर्मों में हर एक मनुष्य को अपने प्राण की तरह प्यार करना, अपने ही समान समझना, सब की आत्मा में एक ही पवित्र ईश्वर के दर्शन करना आदि लिखा है। किन्तु स्पष्ट रूप से अपने पड़ोसी के साथ अच्छा व्यवहार करने और उसके अत्याचारों को भी धैर्यपूर्वक सहन करने के बारे में जो शिक्षा पैग़म्बरे इस्लाम ने खुले शब्दों में दी है वह कहीं और नहीं पाई जाती...।’’ —
‘इस्लाम, मानवतापूर्ण ईश्वरीय धर्म’ पृ॰ 28,41,45 से उद्धृत मधुर सन्देश संगम, नई दिल्ली, 2003 ई॰

पेरियार ई॰ वी॰ रामास्वामी (राज्य सरकार द्वारा पुरस्कृत, द्रविड़ प्रबुद्ध विचारक, पत्रकार, समाजसेवक व नेता, तमिलनाडु)
‘‘...हमारा शूद्र होना एक भयंकर रोग है, यह कैंसर जैसा है। यह अत्यंत पुरानी शिकायत है। इसकी केवल एक ही दवा है, और वह है इस्लाम। इसकी कोई दूसरी दवा नहीं है। अन्यथा हम इसे झेलेंगे, इसे भूलने के लिए नींद की गोलियाँ लेंगे या इसे दबा कर एक बदबूदार लाश की तरह ढोते रहेंगे। इस रोग को दूर करने के लिए उठ खड़े हों और इन्सानों की तरह सम्मानपूर्वक आगे बढ़ें कि केवल इस्लाम ही एक रास्ता है...।’’ ‘‘...अरबी भाषा में इस्लाम का अर्थ है शान्ति, आत्म-समर्पण या निष्ठापूर्ण भक्ति। इस्लाम का मतलब है सार्वजनिक भाईचारा, बस यही इस्लाम है। सौ या दो सौ वर्ष पुराना तमिल शब्द-कोष देखें। तमिल भाषा में कदावुल देवता (Kadavul) का अर्थ है एक ईश्वर, निराकार, शान्ति, एकता, आध्यात्मिक समर्पण एवं भक्ति। ‘कदावुल’ (Kadavul) द्रविड़ शब्द है। अंग्रेज़ी भाषा का शब्द गॉड (God) अरबी भाषा में ‘अल्लाह’ है। ....भारतीय मुस्लिम इस्लाम की स्थापना करने वाले नहीं बल्कि उसका एक अंश हैं...।’’ ‘‘...मलायाली मोपले (Malayali Mopillas), मिस्री, जापानी, और जर्मन मुस्लिम भी इस्लाम का अंश हैं। मुसलमान एक बड़ा गिरोह है। इन में अफ़्रीक़ी, हब्शी और नेग्रो मुस्लिम भी है। इन सारे लोगों के लिए अल्लाह एक ही है, जिसका न कोई आकार है, न उस जैसा कोई और है, उसके न पत्नी है और न बच्चे, और न ही उसे खाने-पीने की आवश्यकता है।’’ ‘‘...जन्मजात समानता, समान अधिकार, अनुशासन इस्लाम के गुण हैं। अन्तर के कारण यदि हैं तो वे वातावरण, प्रजातियाँ और समय हैं। यही कारण है कि संसार में बसने वाले लगभग साठ करोड़ मुस्लिम एक-दूसरे के लिए जन्मजात भाईचारे की भावना रखते हैं। अतः जगत इस्लाम का विचार आते ही थरथरा उठता है...।’’ ‘‘...इस्लाम की स्थापना क्यों हुई? इसकी स्थापना अनेकेश्वरवाद और जन्मजात असमानताओं को मिटाने के लिए और ‘एक ईश्वर, एक इन्सान’ के सिद्धांत को लागू करने के लिए हुई, जिसमें किसी अंधविश्वास या मूर्ति-पूजा की गुंजाइश नहीं है। इस्लाम इन्सान को विवेकपूर्ण जीवन व्यतीत करने का मार्ग दिखाता है...।’’ ‘‘...इस्लाम की स्थापना बहुदेववाद और जन्म के आधार पर विषमता को समाप्त करने के लिए हुई थी। ‘एक ईश्वर और एक मानवजाति’ के सिद्धांत को स्थापित करने के लिए हुई थी; सारे अंधविश्वासों और मूर्ति पूजा को ख़त्म करने के लिए और युक्ति-संगत, बुद्धिपूर्ण (Rational) जीवन जीने के लिए नेतृत्व प्रदान करने के लिए इसकी स्थापना हुई थी...।’’
—‘द वे ऑफ सैल्वेशन’ पृ॰ 13,14,21 से उद्धृत (18 मार्च 1947 को तिरुचिनपल्ली में दिया गया भाषण) अमन पब्लिकेशन्स, दिल्ली, 1995 ई॰

डॉ॰ बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर (बैरिस्टर, अध्यक्ष-संविधान निर्मात्री सभा)
‘‘...इस्लाम धर्म सम्पूर्ण एवं सार्वभौमिक धर्म है जो कि अपने सभी अनुयायियों से समानता का व्यवहार करता है (अर्थात् उनको समान समझता है)। यही कारण है कि सात करोड़ अछूत हिन्दू धर्म को छोड़ने के लिए सोच रहे हैं और यही कारण था कि गाँधी जी के पुत्र (हरिलाल) ने भी इस्लाम धर्म ग्रहण किया था। यह तलवार नहीं थी कि इस्लाम धर्म का इतना प्रभाव हुआ बल्कि वास्तव में यह थी सच्चाई और समानता जिसकी इस्लाम शिक्षा देता है...।’’ —
‘दस स्पोक अम्बेडकर’ चौथा खंड—भगवान दास पृष्ठ 144-145 से उद्धृत

कोडिक्कल चेलप्पा (बैरिस्टर, अध्यक्ष-संविधान सभा)
‘‘...मानवजाति के लिए अर्पित, इस्लाम की सेवाएं महान हैं। इसे ठीक से जानने के लिए वर्तमान के बजाय 1400 वर्ष पहले की परिस्थितियों पर दृष्टि डालनी चाहिए, तभी इस्लाम और उसकी महान सेवाओं का एहसास किया जा सकता है। लोग शिक्षा, ज्ञान और संस्कृति में उन्नत नहीं थे। साइंस और खगोल विज्ञान का नाम भी नहीं जानते थे। संसार के एक हिस्से के लोग, दूसरे हिस्से के लोगों के बारे में जानते न थे। वह युग ‘अंधकार युग’ (Dark-Age) कहलाता है, जो सभ्यता की कमी, बर्बरता और अन्याय का दौर था, उस समय के अरबवासी घोर अंधविश्वास में डूबे हुए थे। ऐसे ज़माने में, अरब मरुस्थलदृजो विश्व के मध्य में है—में (पैग़म्बर) मुहम्मद पैदा हुए।’’ पैग़म्बर मुहम्मद ने पूरे विश्व को आह्वान दिया कि ‘‘ईश्वर ‘एक’ है और सारे इन्सान बराबर हैं।’’ (इस एलान पर) स्वयं उनके अपने रिश्तेदारों, दोस्तों और नगरवासियों ने उनका विरोध किया और उन्हें सताया।’’ ‘‘पैग़म्बर मुहम्मद हर सतह पर और राजनीति, अर्थ, प्रशासन, न्याय, वाणिज्य, विज्ञान, कला, संस्कृति और समाजोद्धार में सफल हुए और एक समुद्र से दूसरे समुद्र तक, स्पेन से चीन तक एक महान, अद्वितीय संसार की संरचना करने में सफलता प्राप्त कर ली। इस्लाम का अर्थ है ‘शान्ति का धर्म’। इस्लाम का अर्थ ‘ईश्वर के विधान का आज्ञापालन’ भी है। जो व्यक्ति शान्ति-प्रेमी हो और क़ुरआन में अवतरित ‘ईश्वरीय विधान’ का अनुगामी हो, ‘मुस्लिम’ कहलाता है। क़ुरआन सिर्फ ‘एकेश्वरत्व’ और ‘मानव-समानता’ की ही शिक्षा नहीं देता बल्कि आपसी भाईचारा, प्रेम, धैर्य और आत्म-विश्वास का भी आह्नान करता है। इस्लाम के सिद्धांत और व्यावहारिक कर्म वैश्वीय शान्ति व बंधुत्व को समाहित करते हैं और अपने अनुयायियों में एक गहरे रिश्ते की भावना को क्रियान्वित करते हैं। यद्यपि कुछ अन्य धर्म भी मानव-अधिकार व सम्मान की बात करते हैं, पर वे आदमी को, आदमी को गु़लाम बनाने से या वर्ण व वंश के आधार पर, दूसरों पर अपनी महानता व वर्चस्व का दावा करने से रोक न सके। लेकिन इस्लाम का पवित्रा ग्रंथ स्पष्ट रूप से कहता है कि किसी इन्सान को दूसरे इन्सान की पूजा करनी, दूसरे के सामने झुकना, माथा टेकना नहीं चाहिए। हर व्यक्ति के अन्दर क़ुरआन द्वारा दी गई यह भावना बहुत गहराई तक जम जाती है। किसी के भी, ईश्वर के अलावा किसी और के सामने माथा न टेकने की भावना व विचारधारा, ऐसे बंधनों को चकना चूर कर देती है जो इन्सानों को ऊँच-नीच और उच्च-तुच्छ के वर्गों में बाँटते हैं और इन्सानों की बुद्धि-विवेक को गु़लाम बनाकर सोचने-समझने की स्वतंत्रता का हनन करते हैं। बराबरी और आज़ादी पाने के बाद एक व्यक्ति एक परिपूर्ण, सम्मानित मानव बनकर, बस इतनी-सी बात पर समाज में सिर उठाकर चलने लगता है कि उसका ‘झुकना’ सिपऱ्$ अल्लाह के सामने होता है। बेहतरीन मौगनाकार्टा (Magna Carta) जिसे मानवजाति ने पहले कभी नहीं देखा था, ‘पवित्र क़ुरआन’ है। मानवजाति के उद्धार के लिए पैग़म्बर मुहम्मद द्वारा लाया गया धर्म एक महासागर की तरह है। जिस तरह नदियाँ और नहरें सागर-जल में मिलकर एक समान, अर्थात सागर-जल बन जाती हैं उसी तरह हर जाति और वंश में पैदा होने वाले इन्सान—वे जो भी भाषा बोलते हों, उनकी चमड़ी का जो भी रंग हो—इस्लाम ग्रहण करके, सारे भेदभाव मिटाकर और मुस्लिम बनकर ‘एक’ समुदाय (उम्मत), एक अजेय शक्ति बन जाते हैं।’’ ‘‘ईश्वर की सृष्टि में सारे मानव एक समान हैं। सब एक ख़ुदा के दास और अन्य किसी के दास नहीं होतेदृचाहे उनकी राष्ट्रीयता और वंश कुछ भी हो, वह ग़रीब हों या धनवान। ‘‘वह सिर्फ़ ख़ुदा है जिसने सब को बनाया है।’’ ईश्वर की नेमतें तमाम इन्सानों के हित के लिए हैं। उसने अपनी असीम, अपार कृपा से हवा, पानी, आग, और चाँद व सूरज (की रोशनी तथा ऊर्जा) सारे इन्सानों को दिया है। खाने, सोने, बोलने, सुनने, जीने और मरने के मामले में उसने सारे इन्सानों को एक जैसा बनाया है। हर एक की रगों में एक (जैसा) ही ख़ून प्रवाहित रहता है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि सभी इन्सान एक ही माता-पिता—आदम और हव्वा—की संतान हैं अतः उनकी नस्ल एक ही है, वे सब एक ही समुदाय हैं। यह है इस्लाम की स्पष्ट नीति। फिर एक के दूसरे पर वर्चस्व व बड़प्पन के दावे का प्रश्न कहाँ उठता है? इस्लाम ऐसे दावों का स्पष्ट रूप में खंडन करता है। अलबत्ता, इस्लाम इन्सानों में एक अन्तर अवश्य करता है—‘अच्छे’ इन्सान और ‘बुरे’ इन्सान का अन्तर; अर्थात्, जो लोग ख़ुदा से डरते हैं, और जो नहीं डरते, उनमें अन्तर। इस्लाम एलान करता है कि ईशपरायण व्यक्ति वस्तुतः महान, सज्जन और आदरणीय है। दरअस्ल इसी अन्तर को बुद्धि-विवेक की स्वीकृति भी प्राप्त है। और सभी बुद्धिमान, विवेकशील मनुष्य इस अन्तर को स्वीकार करते हैं। इस्लाम किसी भी जाति, वंश पर आधारित भेदभाव को बुद्धि के विपरीत और अनुचित क़रार देकर रद्द कर देता है। इस्लाम ऐसे भेदभाव के उन्मूलन का आह्वान करता है।’’ ‘‘वर्ण, भाषा, राष्ट्र, रंग और राष्ट्रवाद की अवधारणाएँ बहुत सारे तनाव, झगड़ों और आक्रमणों का स्रोत बनती हैं। इस्लाम ऐसी तुच्छ, तंग और पथभ्रष्ट अवधारणाओं को ध्वस्त कर देता है।’’ —
‘लेट् अस मार्च टुवर्ड्स इस्लाम’ पृष्ठ 26-29, 34-35 से उद्धृत इस्लामिया एलाकिया पानमनानी, मैलदुतुराइ, तमिलनाडु, 1990 ई॰ (श्री कोडिक्कल चेलप्पा ने बाद में इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था)










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Tuesday, April 26, 2011

मुहम्मद सल्लल्लाहुअलैहि व सल्लम :जन्म और पालन-पोषण mohammed

हज़रत पैग़म्बर मुहम्मद सल्लल्लाहुअलैहि व सल्लम का जन्म ५७१ ई॰ में क़ुरैशश (जिसकी अरब के लोगताज़ीम और आदर व सम्मान करते थे) के क़बीला में मक्का के अंदर हुआ, जो अरब ‌‍‍द्वीप  समूह काधार्मिक केन्द्र समझा जाता है, जहाँ काबा मुशर्रफा है जिसे अबुल-अम्बिया इब्राहीमऔर उनके सुपुत्र इस`माईल अलैहिमस्सलाम ने बनाया था, जिसका अरब के लोग हज्ज करते औरउसका तवाफ करते थे। अभी आप अपनी माँ के पेट ही में थे कि आपके पिता का निधन हो गया।और आप के जन्म के पश्चात ही आपकी माँ भी चल बसीं। चुनाँचे आपको यतीमी की जि़ंदगी बितानी पड़ी, आप के दादा अब्दुल-मुत्तलिब ने आपकी किफालत की। जब आपके दादा की भीमृत्यु हो गई तो आपके चचा अबु-तालिब ने आपकी किफालत संभाली।
आपका क़बीला और उसके आसपास के अन्य क़बाईल बुतों की पूजा करते थे जिन्हें उन्हों ने पेड़, और कुछ को पत्थरऔर कुछ को सोने से बना रखा था और वह काबा के चारों ओर रख दिए गए थे। और लोग उनकेबारे में लाभ और हानि का आस्था रखते थे।
आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पूरीजि़ंदगी सच्चाई और अमानत दारी का पैकर थी, आप  के बारे में बेवफाई, झूठ, खियानत, धोखा और फरेब का कोई उल्लेख नहीं है। आप अपनी क़ौम के बीच 'अमीन' (अमानत दार,विश्वस्त) के लक़ब से प्रसिद्ध थे। लोग आप के पास अपनी अमानतें रखते थे और जब सफरका इरादा करते तो अपनी अमानतें आप के पास सुरक्षित कर देते थे। आप उनके बीच सादिक़(सच्चा आदमी) के नाम से जाने जाते थे; क्योंकि आप जो कुछ कहते और बात चीत करते थेउसमें सच्चाई से काम लेते थे। आप अच्छे व्यवहार वाले, मधु भाषी और ज़ुबान के फसीह थे,लोगों के लिए भलाई और कल्याण को पसंद करते थे। आपकी क़ौम आप से महब्बतकरती थी, अपना और पराया, नज़दीक और दूर का; हर एक आप से महब्बत करता था। आप रूपवान(खुश मन्ज़र) थे, आँख आप को देखने से नहीं थकती थी, इस प्रकार आप खुश अख़्लाक़ औरख़ुश मन्ज़र थे जितना कि यह शब्द अपने अंदर अर्थ रखता है। आपके रब (स्वामी औरपालनहार) ने आप के बारे मेंफरमायाः

निःसंदेह आप महान अख़्लाक़ के मालिकहैं।"(सूरतुक़लम:४)
थामस् कालार्रयल (एक अंग्रेज़ लेखक )अपनी पुस्तक "हीरोज़" केअंदर कहता हैः "बचपन ही से मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को एक विचारक युवाके रूप में देखा जाता था, आपके साथियों ने आपका नाम अमीन (विश्वस्त) -सच्चाई और वफादारीवाला आदमी- रखा, अर्थात अपने कर्म, अपने कथन और अपने विचार में सच्चाई वाला। लोगों नेइस बात का निरीक्षण किया कि आप के मुँह से जो भी शब्द निकलता है वह हिकमतों (विज्ञानऔर बुद्धि) से भरा होता है। मैं उनके बारे में जानता हूँ कि वह बहुत खामोश मिज़ाजथे, जहाँ बोलने का कोई कारण नहीं होता था वहाँ खामोश रहते थे। जब आप बात करते तोहिकमत के मोती झड़ते थे ... हमने आपको पूरी जि़ंदगी दृढ़ सिद्वान्त वाला, ठोससंकल्प वाला, दूरदर्शि ,दयालु, सदात्मा, कृपालु, परहेज़गार (सयंमी) प्रतिष्ठीत औरउदार हृदय वाला देखा है। आप बहुत संजीदा (गंभीर) और निःस्वार्थ थे, इसके बावजूद आपनम्र और सरल, हंस-मुख और प्रफुल्ल, अच्छी आपसदारी और प्रेम भावना वाले थे। बल्किकभी कभी हंसी मज़ाक़ करते थे। प्रायः आपका चेहरा सच्चे दिल से मुसकुराता और चमकतारहता था। आप ज़हीन, बुद्धिमान और शेर दिल (सिंह साहस) थे... स्वभाविक रूप से महान थे।किसी पाठशाला ने आप को शिक्षित नहीं किया था और न किसी शिक्षक ने आपके अख़्लाक़ कोसंवारा और आपको सभ्य बनाया था, आप इस से बेनियाज़ थे... आप ने जीवन में अपने कार्य( मिशन) को अकेले रेगिस्तान के अंदर अंजाम दिया।
पैग़म्बर बनाये जाने से पहले आप कोतन्हाई महबूब हो गई थी, चुनांचे 'ग़ारे-हिरा' (हिरा नामी गुफ़ा) में लम्बी लम्बीरातों तक इबादत करते रहते थे। आप की क़ौम जो खुराफात किया करती थी, आप उन से बहुतदूर रहते थे। चुनांचे आप ने शराब को कभी मुँह नहीं लगाया, किसी बुत के सामने सिरनहीं झुकाया और न उसकी क़सम खाई, और न उस पर कभी चढ़ावा चढ़ाया जैसा कि आपकी क़ौमकिया करती थी। आप ने अपनी क़ौम की बकरियाँ चराईं, आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम नेफरमायाः



"अल्लाह तआला ने जो भी नबी भेजा सबने बकरियाँ चराईं" आप के साथियों नेपूछाः क्या आप ने भी?  आप ने जवाब दियाः "हाँमैं चंद क़ीरात के बदले मक्का वालोंकी बकरियाँ चराया करता था।"सहीह बुख़ारी
जब आप की उमर चालीस साल की हो गई तो आप पर आसमान से वह्य उतरीउस समय आप मक्का में 'गारे-हिरा' के अंदर इबादत कर रहे थे।अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पत्नी उम्मुल-मोमिनीन आइशारजि़यल्लाहु अन्हा कहती हैं: अल्लाह के पैग़म्बर पर वह्य की शुरूआत नीन्द में अच्छे सच्चे सपनों से हुई। आप जो भी सपना देखते थेवह सुब्ह की सफेदी की तरह प्रकट होताथा। फिर आप को तन्हाई महबूब हो गई। चुनाँचे आप 'ग़ारे-हिरा' में तन्हाई अपना लेतेऔर कई कई रात घर आए बिना इबादत में व्यस्त रहते थे। इसके लिए आप तोशा ले जाते थे।फिर आप खदीजा रजि़यल्लाहु अन्हा के पास आते और उतने ही दिनों के लिए फिर तोशा लेजाते। यहाँ तक कि आप के पास हक़ आ गया और आप गारे हिरा ही में थे। चुनाँचे आप केपास फरिश्ता आया और उसने कहाः पढ़ो। आप ने फरमायाः मैं पढ़ा हुआ नहीं हूँ। आप कहतेहैं कि इस पर उसने मुझे पकड़ कर इतना ज़ोर से दबाया कि मेरी शक्ति निचोड़ दी। फिरउसने मुझे छोड़ कर कहाः पढ़ो। मैं ने कहाः मैं पढ़ा हुआ नहीं हूँ। उसने दुबारा पकड़कर दबोचा यहाँ तक कि मैं थक गयाफिर छोड़ कर कहाः पढ़ोतौ मैं ने कहाः मैं पढ़ाहुआ  नहीं हूँ। उसने तीसरी बार मुझे पकड़ कर दबोचाफिर छोड़  कर कहाः                                           
"पढ़ो अपने रब के नाम से जिसने पैदाकिया, मनुष्य को खून के लोथड़े से पैदा किया। पढ़ो और तुम्हारा रब बहुत करम वाला
(दानशील) है।" (सूरतुल अलक़ः १-३)
इन आयतों के साथ अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पलटे,आप का दिल धक धक कर रहा था। खदीजा पुत्री खुवैलिद के पास आए औरफरमायाः "मुझे चादर उढ़ा दो,मुझे चादर उढ़ा दो।"उन्हों ने आपको चादर उढ़ा दियायहाँ तक कि आप का भय समाप्त हो गया।
फिर खदीजा रजि़यल्लाहु अन्हा को पूरी बात बतलाकर कहाः "मुझे अपनी जान का डर लगता है।"
खदीजा रजि़यल्लाहु अन्हा ने कहाः हरगिज़ नहीं,अल्लाह की क़सम ! अल्लाह तआला आप को रुसवा नहीं करेगा। आप सिला-रहमी करतेहैं, कमज़ोरों का बोझ उठाते हैं, दरिद्रों की व्यवस्था करते हैं, मेहमान कीमेज़बानी करते हैं, हक़ की मुसीबतों पर सहायता करते हैं।
इसके बाद ख़दीजा आपसल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को अपने चचेरे भाई वरक़ा बिन नौफिल बिन असद बिनअब्दुल-उज़्ज़ा के पास ले गईं। वह जाहिलियत के काल में ईसाई हो गये थे और इब्रानीमें लिखना जानते थे। चुनाँचे जितना अल्लाह तआला चाहता था इब्रानी भाषा मेंइन्जील लिखते थे। उस समय बहुत बूढ़े और अंधे हो चुके थे। उनसे खदीजा ने कहाः भाईजान! आप अपने भतीजे की बात सुनें।
वरक़ा ने कहाः भतीजे ! तुम क्या देखते हो?  अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जो कुछ देखा था बयान कर दिया।
इस पर वरक़ा ने कहाः यह तो वही नामूस है जिसे अल्लाह तआला ने मूसा अलैहिस्सलाम परउतारा था। काश मैं उस समय शक्तिवान होता ! काश मैं उस समय जि़न्दा होता ! जब आप कीक़ौम आप को निकाल देगी।
अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहिव सल्लम ने फरमायाः"क्या यह लोग मुझे निकाल देंगे?"
वरक़ा ने कहाः हाँ, जब भी कोई आदमी इस तरह कापैग़ाम लाया जैसा तुम लाए हो तो उस से अवश्य दुश्मनी की गई, और अगर मैं ने तुम्हारा समयपा लिया तो तुम्हारी भरपूर सहायता करूंगा।
इसके बाद वरक़ा की शीघ्र ही मृत्यु हो गई  और वह्य का सिलसिला बन्द हो गया। (सहीह बुख़ारी,सहीह मुस्लिम) यह सूरत आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की नुबुव्वत (ईश्दूतत्व) का आरम्भ थी। इसके बाद आपसल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर अल्लाह का यह फरमान उतराः

"ऎ कपड़ा ओढ़ने वाले! खड़ाहो जा और डरा दे। और अपने रब (पालनहार) की महानता (बड़ाई) बयान कर। अपने कपड़े को पाकरखा कर। नापाकी (बुतों की पूजा) को छोड़ दे।" (सूरतुल-मुददस्सिरः १-४)
इस सूरत केद्वारा आपकी पैग़म्बरी रिसालत और दावत का आरम्भ हुआ। चुनाँचे आप ने अपने रसूल(पैग़म्बर) होने का एलान किया और अपनी क़ौम -मक्का वालों-को इस्लाम की दावत देनाशुरू कर दिया। इस पर आप को उनकी ओर से हठ का सामना हुआ और उन्होंने आपकी दावत कोनकार दिया। क्योंकि आप उन्हें एक ऎसी चीज़ की दावत दे रहे थे जो उनके लिए अनोखी थी,और जिस का संबंध उनके सारे धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मामलों से था।उन्हें केवल एक अल्लाह की इबादत करने और उसके सिवा की इबादत छोड़ने की दावत देने, और क़ौम की अक़्लो और उनके पूज्यों –बुतों- को मूर्ख और बुद्धिहीन ठहराने पर बसनहीं किया गया था, बल्कि इस्लाम ने उन पर उनके मनोरंजन, मालदारी और एक दूसरे परगर्व करने के साधन को भी हराम कर दिया। चुनाँचे सूद-ब्याज, जि़ना, जुवा और शराब कोउन पर हराम कर दिया। इसके साथ ही उन्हें तमाम लोगों के बीच अदल व इन्साफ और न्यायकरने की दावत दी, जिनके बीच कोई ऊँच-नीच और भेद-भाव नहीं, अगर है तो केवल तक़्वा(परहेज़गारी) के आधार पर है। ऎसी हालत में क़ुरैशश, जो अरब के सरदार थे, इस बात कोकैसे पसंद कर सकते थे कि उनके और गुलाम के बीच बराबरी पैदा की जाए (और दोनों को एकस्थान पर ला खड़ा किया जाए)। उन्हों ने केवल आप की दावत को नकारने पर ही बस नहींकिया, बल्कि उन्हों ने आप को गाली गलूज के द्वारा दुख पहुँचाया। विभिन्न तोहमतों-झूठ, पागल पन, जादू- से आरोपित किया, जिन से वह आपको अपनी दावत की घोषणा करनेसे पहले आरोपित करने की शक्ति नहीं रखते थे। चुनाँचे उन्होंने अपने बेवक़ूफों को आपके पीछे लगा दिया जिन्हों ने आप को सताया और आपके साथियों को तकलीफें पहुंचाईं। आप को  शारीरिक तकलीफ भी दी गई।
अब्दुल्लाह बिन मसऊद रजि़यल्लाहु अन्हु कहते : आपसल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम काबा के पास नमाज़ पढ़ रहे थे और क़ुरैशश की एक जमाअतअपनी बैठक में थी कि इतने में उनके एक कहने वाले ने कहाः क्या तुम इस रियाकार कोनहीं देखते, कौन है जो आले-फलाँ के ऊँटों के पास जाए और उस की ओझड़ी ले कर आए और जब वह सज्दा करें तो उनके दोनों कंधों के बीच (पीठ) पर डाल दे?  इस पर क़ौम का सबसेअभागा आदमी उठा, ओझड़ी  ले आया और जब पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सज्दे मेंगये तो उसे आप की पीठ पर दोनों कंधों के बीच डाल दिया। पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहिव सल्लम सज्दे ही में पड़े रहे और वह लोग इस तरह से हँसे कि हँसी के मारे एक दूसरेपर गिरने लगे। फिर किसी ने जा कर फातिमा रजि़यल्लाहु अन्हा को बताया। वह उस समयछोटी बच्ची थीं। चुनाँचे वह दौड़ कर आईं और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सज्देही में थे यहाँ तक कि उन्होंने आप की पीठ से ओझड़ी हटा कर फेंकीं और उन लोगों कोबुरा भला कहने लगीं। (सहीह बुख़ारी)
मुनीब अल-अज़दी कहते हैं: मैं ने जाहिलियत केज़माने  में अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को देखा है कि आप फरमारहे थेः
"ऎ लोगो! ला-इलाहा-इल्लल्लाह कहो कामयाब हो जाओगे।" इस पर कुछ लोगों नेआपके चेहरे पर थूक दिया, कुछ ने आप पर मिटटी फेंकी, और कुछ ने गालियाँ दीं, यहाँतक कि दोपहर हो गया, तो एक बच्ची पानी का एक बड़ा प्याला ले कर आई और उस से आप काचेहरा और हाथ धोया। इस पर आप ने कहाः "ऎ प्यारी बेटी! अपने बाप पर ग़रीबी औररुसवाई से न डर।" (अल-मोजमुल कबीर लित-तबरानी)
उरवा बिन ज़ुबैर कहते हैं :मैं नेअब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस से पूछा कि मुाशरिकीन ने पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहिव सल्लम के साथ जो सब से सख्त तरीन (बुरा) बरताव किया था आप मुझे उसके बारें मेंबतायें?  उन्हों ने कहाः पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम काबा के पास नमाज़पढ़ रहे थे कि उक़्बा बिन अबी मुअ़ैत आ गया। उसने आते ही अपना कपड़ा आप की गर्दनमें डाल कर कठोरता से आप का गला घूँटा इतने में अबु बक्र आ गये और उन्हों ने उसकाकंधा पकड़ कर धक्का दिया और उसे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से दूर करते हुएफरमायाः तुम लोग एक आदमी को इस लिए मार डालना चाहते हो कि वह कहता है मेरा रबअल्लाह है और तुम्हारे पास तुम्हारे रब के पास से खुली हुई निाशनियाँ ले कर आयाहै? (सहीहबुख़ारी)

यह सारी घटनायें पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को अपनी दावत को जारी रखने से न रोक सकीं। चुनाँचे आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हज्ज केलिए मक्का आने वाले क़बीलों पर इस्लाम को पेश करते थे। जिसके फलस्वरूप यसरिब - जोआज 'मदीना तैयिबा' के नाम से सुप्रसिद्ध है -के कुछ लोग आप पर ईमान ले आए और आप कोयह वचन दिया कि अगर आप उनके पास आते हैं तो वह आपकी मदद और हिफाज़त करेंगे। आप नेउनके साथ अपने एक साथी मुसअब बिन उमैर रजि़यल्लाहु अन्हु को उन्हें इस्लाम कीशिक्षा देने के लिए भेजा। फिर उस अत्याचार और तकलीफ व परेाशनी के बाद जो आपको औरआप पर ईमान लाने वाले कमज़ोर लोगों को अपनी क़ौम की तरफ से पहुँची, आप के रब ने आपको मदीना की ओर हिज्रत कर जाने की आज्ञा दे दी। मदीना वालों ने आप का बेहतरीन स्वागत किया।

इस प्रकार मदीना आप की दावत का केन्द्र और इस्लामी राज्य की राजधानी बनगया। पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उसको अपना ठिकाना बना लिया और लोगोंको क़ुरआन पढ़ाना और उन्हें दीन के अहकाम (धर्म-शास्त्र्) की शिक्षा देना शुरू करदिया। मदीना के लोग पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सदव्यवहार और महानगुणों से बहुत प्रभावित हुए और आप से हर चीज़ से बढ़ कर, यहाँ तक कि अपनी जानों सेभी अधिक महब्बत करने लगे। वह आपकी सेवा करने में एक दूसरे से आगे बढ़ने की कोशिश  करते थे और आप के रास्ते में क़ीमती से क़ीमती चीज़ निछावर कर देते थे। उन्होंनेईमान   और           रूहानियत के समाज में जि़ंदगी गुज़ारी जो खुशहाली और सौभाग्य से   परिपूर्णथा। जहाँ समाज के हर व्यक्ति के बीच महब्बत, उल्फत और भाईचारगी के रिश्ते प्रकाश मेंआए। चुनाँचे धनी और निधर्न,शरीफ (सज्जन) और नीच, गोरा और काला, अरबी और अजमी;  इसमहान दीन में बराबर हो गये। उनके बीच केवल तक़्वा (सयंम) के आधार पर ही कोई फ़र्क औरअंतर रह गया। पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के मदीना में एक साल ठहरने केबाद आप के और आपकी उस क़ौम के बीच, जिसे आपकी दावत की प्रगति (तरक्क़ी) बुरी लग रहीथी, सामना और टकराव शुरू हो गया। तथा इस्लामी इतिहास की पहली लड़ाई अर्थात 'बद्र' कीलड़ाई दो ऎसे दलों के बीच घटित हुई, जो दोनों आपस में संख्या और जंगी हथियार मेंएक दूसरे से बहुत मुख़्तलिफ (विभिन्न) थे; मुसलमानों  की संख्या ३१४ और मुशरिकों कीसंख्या १,०००थी। अल्लाह सुब्हानहु व तआला ने अपने पैग़म्बर और उनके साथियों की सहायताकी और उनकी जीत हुई। फिर इसके बाद मुसलमानों और मुशरिकीन के बीच लगातार एक के बाददूसरी लड़ाईयाँ होती रहीं। आठ साल के बाद पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम दसहज़ार (१०,०००)योद्धाओं की फौज तैयार करने में सफल हो गये। उसे लेकर मक्का की ओर रवाना हुए और उसमें विजेता बनकर प्रवेश  किया और अपने क़बीले और अपनी उस क़ौम को पराजित करदिया जिसने आप को हर प्रकार की तकलीफें दी थी और आप के मानने वालों को विभिन्न प्रकार की यातनाओं से दोचार किया था यहाँ तक कि उन्हें अपने धन-दौलत, बाल-बच्चे औरघर-बार को त्यागने पर मजबूर कर दिया था। आप ने उन्हें पराजित कर दिया और उन परकरारी जीत प्राप्त की। चुनाँचे उस साल का नाम ही "विजय का साल"  पड़ गया जिसकेबारे में अल्लाह तबारक व तआला नेफरमायाः

जब अल्लाह की मदद और फत्ह विजय आजाए। और तू लोगों को अल्लाह के दीन में गिरोह ही गिरोह आता देख लेतो आपने रब कीतस्बीह करने लग हम्द के साथ और उससे क्षमा की प्राथर्ना करनिःसंदेह वह बड़ा हीक्षमा करने वाला है।"(सूरतुन-नस्रः १-३)
फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मक्कावालों को जमा करके उनसे कहाः "तुम्हारा क्या खयाल है मैं तुम्हारे साथ क्या करनेवाला हूँ?" उन्होंने कहाः अच्छा, आप करीम (दयालु) भाई हैं और करीम (दयालु) भाई केबेटे हैं। आप ने फरमायाः "जाओ तुम सब आज़ाद हो।" (सुनन बैहक़ी अल-कुब्रा)
फत्हेमक्का के कारण बहुत से लोग इस्लाम में प्रवेश किए। फिर पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहिव सल्लम मदीना वापस लौट गए और एक समय काल के बाद अपने मानने वाले साथियों में से एकलाख चौदह हज़ार साथियों के साथ हज्ज के लिए मक्का की ओर रवाना हुए और यह   हज्ज'हज्जतुल-वदाअ' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस लिए कि यह हज्ज मुसलमानों को बिदा कहनेके समान था क्योंकि आप की वफात का समय करीब आ गया था।
पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का मदीना में सोमवार के दिन १२ रबीउल-अव्वल सन` ११ हि॰ को स्वर्गवास हुआ औरउसी दिन आप को दफन किया गया। आप की वफात पर मुसलमानों को बहुत गहरा दुख हुआ यहाँ तककि कुछ सहाबा ने इस खबर को सच्चानहीं माना। उन्हीं में से उमर बिन खत्ताबरजि़यल्लाहु अन्हु हैं। उन्हों ने कहाः जिसको मैं ने यह कहते हुए सुन लिया किमुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मृत्यु हो गई, उसकी गदर्न उड़ा दूँगा। इस परअबू-बक्र रजि़यल्लाहु अन्हु खड़े हुए और अल्लाह तआला के इस फर्मान की तिलावत की

"मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम केवल एक पैग़म्बर ही हैंइन से पहले बहुत सेपैग़म्बर हो चुके हैंक्या अगर उनकी वफात हो जाए या वह शहीद हो जाएँतो तुमइस्लाम से अपनी ऎडि़यों के बल फिर जाओगेऔर जो कोई फिर जाए अपनी ऎडि़यों पर तो वहहरगि़ज़ अल्लाह तआला का कुछ न बिगाड़ेगा। और अनक़रीब अल्लाह तआला शुक्रगुज़ारों कोअच्छा बदला देगा।" (सूरत आल इम्रानः १४४)
जब उमर रजि़यल्लाहु अन्हु ने यह आयत सुनी तोइस पर ठहर गए, और आप रजि़यल्लाहु अन्हु अल्लाह की किताब पर अमल करने वाले थे। वफात के समय पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की उम्र  त्रिसठ (६३) साल की थी; पैग़म्बरबनाए जाने से पहले आप मक्का में चालीस साल रहे और नबी होने के बाद तेरह साल तकमक्का में रहे और लोगों को तौहीद की दावत देते रहे। फिर आप ने मदीना की ओर हिज्रतकी और वहाँ दस साल तक कि़याम किया। आप पर वह्य के उतरने का सिलसिला लगातार जारी रहायहाँ तक कि आप पर पूरा क़ुरआन उतर गया और इस्लाम के अहकाम व क़वानीन परिपूर्णहोगये।

डा जी लीबोन (Dr.G.Lebon) अपनी किताब 'अरब की सभ्यता' में कहते हैं:"यदि लोगों की क़ीमत और महत्व को उनके महान कारनामों के द्वारा आंका जाए तो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इतिहास में सबसे महान लोगों मे से हैं, पच्छिमी देाशों केविद्वानों ने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ इन्साफ से काम लेना शुरूकर दिया है, जब कि धार्मिक कटटरपन और पक्षपात ने बहुत से इतिहासकारों की आँखों कोआप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की महानता को स्वीकार करने से अंधा कर दिया है।

अल्‍लाह के पैग़म्बर के कुछ शिष्टाचार (आदाबे जि़न्‍दगी) mohaamed

१. पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने साथियों से निकट और मिल जुल कर रहते थे।इसकी पुष्टि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जीवन के तमामविभागों और आप के सारे निजी और सामान्य मामलों की पूरी जानकारी प्राप्त करने सेहोती है। इस लिए कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ही वह आदर्श और नमूना हैं जिनकी तमाम मामलों में पैरवी और अनुसरण करना चाहिए। जरीर बिन अब्दुल्लाहरजि़यल्लाहु अन्हु कहते हैं: जब से मैं इस्लाम लाया हूँ पैग़म्बर सल्लल्लाहुअलैहि व सल्लम ने मुझे अपने पास आने से नहीं रोका, और जब भी मुझे देखा तो मुसकुरादिया, मैं ने आप से शिकायत की कि मैं घोड़े पर स्थिर नहीं रह पाता हूँ तो आप नेअपने हाथ से मेरे सीने पर मारा और यह दुआ कीः॑॑
"ऎ अल्लाह तू इसे स्थिर कर दे और इसेमार्ग दर्शाने वाला और मार्ग दर्शाया हुआ बना।"(सहीह बुख़ारी और सहीहमुस्लिम)
पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने साथियों के साथ हंसी-मज़ाक़ औरचुहल किया करते थे, अनस बिन मालिक रजि़यल्लाहु अन्हु कहते हैं किः   पैग़म्बरसल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम लोगों में सब से अच्छे अख्लाक़ वाले थे, मेरा एक भाई थाजिसे अबू-उमैर कहा जाता था, (हदीस के बयान करने वाले) कहते हैं: मेरा ख्याल है कि अनसने कहा कि वह छोटे थे, अनस कहते हैं: जब पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम आतेऔर उनको देखते तो कहतेः "ऎ अबू-उमैर, तुम्हारी चिडि़या क्या हुई।" वह कहते हैं इसतरह आप उनके साथ खेलते थे। (सहीह बुख़ारीऔर सहीह मुस्लिम)

आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हँसी-मज़ाक केवल बात चीत पर बस नहीं थी बल्कि आप अपने साथियों के साथ अमलीतौर पर (क्रियात्मक रूप से) हँसी-मज़ाक और चुहल किया करते थे। अनस बिन मालिक-रजि़यल्लाहु अन्हु कहते हैं कि एक देहाती आदमी जिस का नाम ज़ाहिर बिन हराम थापैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को उपहार (तोहफा) दिया करता था, जब वह वापस जाना चाहता तो पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उसके लिए कोई चीज़ तैयार करते थे। पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनके बारे में कहाः "ज़ाहिर हमारे देहातीऔर हम उनके शहरी (साथी) हैं।" अनस कहते हैं, एक दिन वह अपना सामान बेच रहे थे किपैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम आये और उनके पीछे से उन्हें पकड़ लिया और वहआप को देख नहीं पा रहे थे। चुनाँचे उन्हों ने कहाः यह कौन है?  मुझे छोड़ दे। आप नेअपना चेहरा उनकी ओर किया, जब वह पहचान गए कि यह पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हैं तो अपनी पीठ को आपके सीने से चिपकाने लगे। पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम ने फरमायाः "यह ग़ुलाम कौन खरीदेगा?" ज़ाहिर ने कहाः ऎ अल्लाह केपैग़म्बर आप मुझे सस्ता पाएंगे। आप ने फरमायाः"किन्तु तुम अल्लाह के निकट सस्ते नहीं हो" या पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह फरमाया कि "तुम अल्लाह केपास बहुमूल्य हो।" (सहीह इब्नेहिब्बान)
२.अपने साथियों से परामशर करनाः जिनचीज़ों के विषाय में कोई नस (यानी अल्लाह की ओर से कोई स्पष्ट प्रमाण) नहीं होताथा, पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उन तमाम मामलों में अपने साथियों से सलाह-मशवरा (परामशर) किया करते थे और उनके विचार को स्वीकार करते थे। अबू हुरैरारजि़यल्लाहु अन्हु कहते हैं: मैं ने अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लमसे बढ़ कर किसी को भी अपने साथियों से सलाह-मशवरा करते हुए नहीं देखा। (सुननतिरमिज़ी)
३. बीमार की तीमार दारी करना चाहे वह मुसलमान हो या काफिरःपैग़म्बरसल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने साथियों के बारे में पूछते और उनकी ख़बरगीरी कियाकरते थे। अगर आप को बताया जाता कि कोई बीमार है तो आप और आपके पास उपस्थित सहाबाउसकी तीमार दारी के लिए दौड़ पड़ते थे। आप केवल मुसलमान बीमारों की ही तीमार दारीनहीं करते थे बल्कि उनके अतिरिक्त दूसरे लोगों की भी तीमार दारी किया करते थे। अनसरजि़यल्लाहु अन्हु कहते हैं : एक यहूदी बच्चा पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लमकी सेवा किया करता था, वह बीमार पड़ गया तो पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लमउसकी तीमार दारी करने के लिए गये, उसके सिर के पास आप बैठ गये और उस से कहाः "तूइस्लाम ले आ" उसने अपने पास बैठ हुए अपने बाप की ओर देखा, तो उसके बाप ने कहाःअबुल-क़ासिम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की बात मान ले, चुनांचे वह       मुसलमान हो गया, फिर आप वहाँ से यह कहते हुए निकलेः "सभी तारीफ अल्लाह के लिए है जिस ने उसे आग सेबचा लिया।"(सहीह बुख़ारी)
४. पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम भलाई का शुक्रियाअदा करते थे और उसका अच्छा बदला देते थे :आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फर्मानहैः "अगर कोई तुम से अल्लाह के वास्ते पनाह मांगे तो उसे पनाह दे दिया करोऔर जोतुम से अल्लाह के नाम से कोई चीज़ मांगे तो उसे प्रदान कर दिया करोऔर जो तुम्हेंआमंत्र्ण दे उसके आमंत्र्ण को स्वीकार करोऔर जो तुम्हारे साथ कोई भलाई करे तोउसका बदला दोअगर तुम्हारे पास उस को बदला देने के लिए कोई चीज़ न हो तो उसके लिएदुआ करो यहाँ तक कि तुम जान लो कि तुम ने उसका बदला पूरा कर दिया।" (सुनन अबूदाऊद)
आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की बीवी आइशा रजि़यल्लाहु अन्हा आप के   बारे   मेंफरमाती हैं: अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तोहफा स्वीकार करते   थेऔर उसका बदला भी देते थे। (सहीह बुख़ारी)
यानी बदले में आप भी तोहफा देते थे।
५.पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हर सुंदर और बढि़या चीज़ को पसंद करते थेःअनसरजि़यल्लाहु अन्हु कहते हैं: मैं ने कोई हरीर और दीबा नहीं छुआ जो पैग़म्बरसल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हथेली से अधिक कोमल हो। और न कभी कोई ऎसी  सूं?शी जो पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की खुशबु से अधिक बढि़या हो। (सहीहबुख़ारी   और सहीह मुस्लिम)   
६. पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम भलाई और नेक काम     केहर मैदान में सिफारिश करना पसंद करते थेःइब्ने अब्बास रजि़यल्लाहु अन्हुमा बयानकरते हैं कि बरीरा के पति एक ग़ुलाम थे जिनका नाम मुग़ीस था, गोया मैं उन्हें देखरहा हूँ कि वह उसके पीछे-पीछे रोते हुए चल रहे हैं और उनके आँसू उनकी दाढ़ी पर बहरहे हैं। यह देख कर पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अब्बास से कहाः ऎअब्बास! क्या आप को इस बात से आश्चर्य नहीं होता कि मुग़ीस किस तरह बरीरा से टूट करप्यार करते हैं और बरीरा किस तरह मुग़ीस से नफरत करती है? फिर पैग़म्बरसल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने (बरीरा) से कहाः "अगर तू उसके पास लौट जात" उसने कहाः ऎ अल्लाह के पैग़म्बर! क्या आप मुझे हुक्म दे रहे हैं? आप सल्लल्लाहु अलैहिव सल्लम ने फरमायाः "मैं सिफारिश कर रहा हूँ।" उसने कहाः मुझे उनकी कोई    ज़रूरतनहीं। सहीह बुख़ारी
७. पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपनी सेवा स्वयं करतेथेःआइशा रजि़यल्लाहु अन्हा से जब पूछा गया कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लमअपने घर में क्या करते थे? तो उन्हों ने बतायाः आप मनुष्यों में से एक मनुष्यथे, अपने कपड़े धोते, अपनी बकरी दूहते और अपनी सेवा करते थे। (सहीह इब्ने हिब्बान)
बल्कि आप के अख्लाक़ की शराफत और बड़प्पन केवल अपनी सेवा आप तक ही सीमित नहीं थाबल्कि आप दूसरों की भी सेवा किया करते थे। आपकी पत्नी आइशा रजि़यल्लाहु अन्हा से जबपूछा गया कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने घर में क्या किया करते थे? तो उन्हों ने कहाः आप अपने घर वालों की सेवा में लगे रहते थे, जब अज़ान सुनते तोनिकलजाते। (सहीह बुख़ारी)

हज़रत पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ईश्दूतत्व पर पिछली आसमानी ग्रंथों से प्रमाण mohamad

(पाठकको इस बात से अवगत होना चाहिए कि तौरात और इन्जील के इन कथनों में वर्णित कुछ बातोंको हम स्वीकार नहीं करते हैं, किन्तु हमने यहाँ उनका उल्लेख इसलिए किया है ताकियहूदियों और ईसाइयों पर उनकी उन किताबों से तर्क स्थापित किया जाए जिन पर वहविश्वास रखते हैं।)
अता बिन यसार कहते हैं: मेरी मुलाक़ात अब्दुल्लाह बिन अम्र बिनआस रजि़यल्लाहु अन्हुमा से हुई तो मैं ने उनसे कहाः मुझे तौरात में अल्लाह केपैग़म्बर(सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के गुण विशेषता (विलक्षण) के संबंध मेंबतलाईये? उन्होंने कहाः हाँ, अवश्य! अल्लाह की सौगंध तौरात में आपकी उन्हीं कुछविशेषताओं एंव गुणों का वर्णन हुआ है जो क़ुरआन में वर्णित है। "ऎ नबी! हम नेआप को गवाही देने वाला (साक्षी) ,शुभ सूचना देने वाला, डराने वाला और उम्मियों(अनपढ़ों) के लिए सुरक्षक और सहायक बनाकर भेजा है। आप मेरा बन्दा और संदेश्वाहक(पैग़म्बर) हैं, मैं ने आप का नाम मुतवक्किल रखा है, आप उजड और दुश्चरित्र नहीं हैंऔर न ही बाज़ारों में हल्ला-गुहार मचाने वाले हैं, और आप बुराई का बदला बुराई सेनहीं देते हैं, बल्कि माफ कर देते और क्षमा से काम लेते हैं। मैं आपको उस समय तकमृत्यु नहीं दूंगा जब तक कि आपके द्वारा टेढ़ी मिल्लत (पथ-भ्रष्ट राष्ट्र) को सीधान कर दूँ और वह लोग यह न कहने लगें कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं, औरजबँ तक कि मैं आपके द्वारा अंधी आँखों, बहरे कानों और बन्द दिलों को खोल न दूँ।"(सहीह बुख़ारी)
प्रोफेसर अब्दुल अहद दाऊदकहते हैं: ... किन्तु मैं ने अपने (तर्क-वितर्क)में बाईबल के कुछ अंशों को आधार बनाने की कोशिश की है जो बहुत कम ही किसीभाषा -संबन्धी विवाद की आज्ञा देता है, और मैं लातीनी (प्रचीन रोमन) या यूनानी याआरामी भाषा की ओर नहीं जाऊँगा; क्योंकि इसका कोई लाभ नहीं है। मैं निम्न मेंकेवल ठीक उन्हीं शब्दों को बाईबल के उस संशोधित संस्करण से प्रस्तुत कर रहा हूँजिसे ब्रिटिश और विदेशी बाईबल सूसायटी ने प्रकाशित किया है। तौरात के पुस्तक "डयूटरोनामी" (अध्यायः१८, वाक्यः१८) में हम यह शब्द पढ़ते हैं: "मैं उनके लिए उनकेभाईयों ही में से तेरे समान एक नबी बनाऊँगा और अपने वचन आदेश को उसके मुँह में रखदूँगा।"
यदि ये शब्द "मुहम्मद" र पर पूरे नहीं उतरते हैं तो अभी तक इनका पूराहोना बाक़ी है। क्योंकि स्वयं ईसा मसीह ने कभी यह दावा नहीं किया है कि जिस नबी कीओर यहां संकेत किया गया है, वह नबी वही हैं। यहाँ तक कि उनके शिष्यों का भी यहीविचार था और वह मसीह के पुनः लौट कर आने की आशा कर रहे थे ताकि उपरोक्त पेशीनगोई(भविष्यवाणी) परिपूर्ण हो। यह बात आज तक प्रमाणित और निर्विरोध है कि ईसा मसीह का प्रथमआगमन इस बात पर तर्क  नहीं है जो तौरात के इस वाक्य में आया है कि "मैं उनके लिए तेरेसमान एक नबी खड़ा करूँगा"। इसी प्रकार ईसा मसीह का दूसरी बार आगमन भी इन शब्दों का अर्थनहीं रखता है। ईसा मसीह का (पुनः) आगमन जैसा कि उनके चर्च का मानना है एक न्यायधीशके रूप में होगा, एक धर्म-शास्त्र् प्रस्तुत करने वाले के रूप में नहीं होगा। जबकिप्रतिज्ञित व्यक्ति वह है, जो 'अपने दाहिने हाथ में प्रज्वलित अग्निमय शास्त्र' लेकरआएगा।
प्रतिज्ञित नबी की व्यक्तित्व का ठीक ठीक पता लगाने के लिए किसी प्रकार से मूसाअलैहिस्सलाम की ओर मन्सूब एक भविष्यवाणी बहुत सहायक है, जो 'फारान से अल्लाह केचमकने वाले प्रकाश' के विषय पर बात चीत करती है, और वह (फारान) मक्का की एक पहाड़ीहै। तथा तौरात -व्यवस्था विश्वरण- अध्याय (३३) वाक्य (२) मे उल्लिखित शब्द इस प्रकार हैं :"रब –परमेश्वर-सीना से आया और सेईर से उनके लिए प्रकट हुआ और फारान की पहाड़ी सेचमका, और उसके साथ दस हज़ार पवित्र लोग आए, और उसके दाहिने हाथ से उनके लिए शरीअत(धर्म-शास्त्र) की अग्नि प्रकट हुई"।
इन शब्दों में रब के प्रकाश को सूर्य के प्रकाश केसमान बताया गया है, "जो सीना से आता है और उनके लिए सेईर से उदय होता है, किन्तुवह र्गव और शोभा के साथ 'फारान' से चमकता है जहाँ उसके साथ दस हज़ार सन्त प्रकट होनेथे, और वह अपने दाहिने हाथ में उनके लिए धर्म-शास्त्र उठाए हुए होता है। किसी भीइस्राईली का जिसमें ईसा मसीह भी सम्मिलित हैं 'फारान'से कोई संबंध नहीं है। 'हाजर'अपने बेटे 'इस्माईल'के साथ 'बीर-सबा'के मरूस्थल में घूमती रहीं और उन्हीं लोगोंने इसके बाद 'फारान'के रेगिस्तान में निवास ग्रहण किया। (जिनेसिस –उत्पत्ति-अध्यायः२१वाक्यः२१)
इसमाईल अलैहिस्सलाम की माँ ने एक मिस्री औरत से उनकी शादी करदी, और उनके पहले बेटे 'क़ीदार' की नस्ल से 'अदनान' पैदा हुए जिनके वंश से वह अरबलोग हैं जिन्हों ने उसी समय से 'फारान' के मरूभूमि में निवास ग्रहण किया और उसेअपना निवास स्थान बना लिया। तो जब मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जैसाकि सब जानते हैं 'इस्माईल॔अलैहिस्सलाम और उनके बेटे क़ीदार (अदनान) की नस्ल से हैं, फिर इसके बाद आप फारानमरूभूमि में प्रकट हुए, फिर दस हज़ार पवित्र लोगों (मुसलमानों) के साथ मक्का मेंप्रवेश किए और अपनी जनता के पास प्रज्वलित (धर्म-शास्त्र) शरीअत लेकर आए। क्या यहवही पीछे उल्लेख की गई भविष्वाणी (पेशीनगोई )नहीं है जो हरफ ब हरफ (यथाशब्द) पूरीहुई है??...
तथा वह भविष्यवणी जो (हबक़ूक़ नबी) लेकर आए वह विशेष रूप सेविचार करने और ध्यान देने के योग्य है, और वह यह हैः "क़ुद्दुस फारान पहाड़ से। उसकेजलाल ने आसमानों को ढाँप लिया और धरती उसकी प्रशंसा, सराहना और पाकी से भर गई"।
यहाँ पर "सराहना" का शब्द बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि "मुहम्मद" नाम का शाब्दिक अर्थहोता है "जिसकी सराहना कि गई हो"। इस से बढ़ कर बात यह है कि अरब के लोग जो कि'फारान'मरूस्थल के वासी हैं, उनसे भी वहय के उतरने का वादा किया गया थाः "मरूभूमिऔर उनके नगरों उन जगहों पर अपनी आवाज़ बुलंद करो जहाँ क़ीदार (अदनान) ने निवास किया, "साले" के निवासियो पहाड़ों की चोटियों के ऊपर से गाओ और ऊँची आवाज़ में चिल्लाओ, रब (पालनहार) की प्रतिष्ठा का वर्णन करो और उसकी पाकी और प्रांसा को द्वीपों मेंफैलाओ, रब एक शक्तिमान व्यक्ति के समान बाहर निकलेगा और एक जंगजू योद्धा)के समानअपनी ग़ैरत को उभारेगा, वह पुकारेगा और ज़ोर से ललकारेगा और अपने दुश्मनो पराजित करेगा
   (यशायाह ४२:११-१३)
इस विषय से संबंधितदो अन्य भविष्यवाणियाँ भी हैं जोध्यान देने के योग्य हैं जिन में क़ीदार (अदनान) के चर्चा का संकेत आया है, पहलीभविष्यवाणी यशायाह के अध्यायः ६० में है जो इस प्रकार हैः "तू उठ जाग और जगमगा!क्योंकि तेरा प्रकाश आ रहा है, और रब की महिमा तेरे ऊपर चमकेगी ... मिद्दान और एपा देशों के ऊँटों के झुण्ड तेरी धरती को ढक लेंगे। शिबा के देश से ऊँटों की लम्बीपंक्तियाँ तेरे यहाँ आयेंगी। ... क़ेदार की सारी भेड़ें तेरे पास इकटठी होजायेंगी, नबायोत के मेढ़े तेरी सेवा में लाए जायेंगेगे और मेरी वेदी -क़ुबार्न गाह-पर स्वीकार करने के लायक़ बलियाँ बनेंगे और मैं अपने अदभूत मन्दिर और अधिक सुंदरबनाऊँगा..."

इसी प्रकार दूसरीभविष्यवाणी भी यशायाह २१:१३-१७ में आई है, वह इसप्रकार हैः "अरब के लिए परमेश्वर का संदेश"। हे ददानी के क़ाफिले, तू रात अरब केमरूभूमि में कुछ वृक्षों के पास गुज़ार ले। कुछ प्यासे यात्र्यिों को पीने को पानीदो। तेमा के लोगो, उन लोगों को भोजन दो जो यात्र कर रहे हैं। वे लोग ऎसी तलवारों सेभाग रहे थे जो उन को मारने को तत्पर थे। वे लोग उन धनुषों से बचकर भाग रहे थे जोउन पर छूटने के लिए तने हुए थे। वे भषण लड़ाई से भाग रहे थे। मेरे स्वामी नेमुझे बताया था की ऎसी बातें घटेंगी। "एक वर्ष में (एक ऎसा ढँग जिससे मज़दूरकिराये का समय गिनता हैं।) क़ेदार का वैभव नष्ट हो जायेगा। उस समय क़ेदार के थोड़ेसे धनुषधारी, प्रतापी सैनिक ही जीवित बच पायेंगे।"
यशायाह की इन भविष्यवाणियों को तौरात की एक पुस्तक "व्यवस्था विवरण" (३३:२) को सामने रख कर पढि़ए जो "पारान सेअल्लाह –परमेश्वर- के प्रकाश के चमकने"के संबंध में वार्तालाप करता है।
जब इस्माईलअलैहिस्सलाम ने 'पारान' के मरूस्थल में निवास किया, जहाँ उनके घर क़ेदार (अदनान) नेजन्म लिया जो कि अरब के सर्वोच्च पूर्वज हैं। और अगर क़ेदार के संतान पर यह लिखदिया गया था कि उनके पास अल्लाह की ओर से वही (ईश्वाणी) आएगी। और केदार के रेवड़ कोपवित्र वेदी पर बलि दिये जाने को स्वीकार करना था, परमेश्वर के  प्रतिष्ठा के  घर कोवैभव प्रदान करने के लिए। जहाँ कई शताब्दियों तक अँधकार छाया रहा था और फिर उसीधरती को अल्लाह के प्रकाश को स्वीकार करना था। और अगर केदार को प्राप्त होने वालायह सारा वैभव और धनुषधारियों की यह संख्या और इसी प्रकार केदार की संतान केबहादुरों के सारे वैभव - इन सारी चीज़ों को लटकती हुई तलवार और तनी हुई कमान केसामने से भागने के एक वर्ष के बीच ही नष्ट हो जाना था तो प्रश्न यह है कि क्या इसबात से 'पारान'के एक व्यक्ति 'मुहम्मद' के अतिरिक्त कोई और मुराद हो सकता है?! (हबक़ूक़ ३:३)
मुहम्मदसल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इस्माईल –अलैहिस्सलाम- के वंश सेहैं और क़ेदार (अदनान) की संतान से आप उनके बेटे हैं जिसने 'पारान'के मरूस्थल मेंस्थाई निवास ग्रहण किया। और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ही वह एक मात्र  पैग़म्बर हैं जिनके द्वारा अरब ने अल्लाह का संदेश प्राप्त किया, जिस समय धरती परअन्धकार छाया हुआ था। और आपके के द्वारा ही 'पारान' में अल्लाह के प्रकाश की किरणेंचमकीं। और मक्का ही वह एक मात्र नगर है जहाँ परमेश्वर के घर में उसके नाम काआदर और वैभव हुआ। "और इसी प्रकार केदार के रेवड़ अल्लाह के घर की वेदी पर आकरस्वीकार किए जाने लगे।" मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को आपकी क़ौम ने सतायाऔर आप पर अत्याचार किया। चुनांचे आप मक्का छोड़ने पर विवश हो गए, और आप को लटकतीहुई तलवारों और तनी हुई कमानों से भागने के दौरान प्यास लगी। और आपके भागने के एकसाल बाद ही बद्र के युद्ध में क़ेदार के पोतों (संतान) से आप की मुठभेड़ हुई। यही वहस्थान है जहाँ मक्का वालों और पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बीच पहलीलड़ाई हुई। और इस के बाद ही केदार के पोते (जो कि धनुषधारी थे) पराजित हो गये। फिरकेदार का सारा वैभव नष्ट हो गया। इस लिए अगर पवित्र ईश्दूत (मुहम्मदसल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)को वह्य (परमेश्वरका संदेश) स्वीकारने वाला और इन सारी पेशीनगोईयों (भविश्यवाणियों) को सच्चा कर दिखानेवाला नहीं समझा जाता है तो इसका अर्थ यह होता है कि यह भविष्यवाणियाँ अभी तक सच्चीघटित नहीं हुई हैं? ... इसी प्रकार रब (परमेश्वर) का घर जिसमें उसकी प्रतिष्ठा औरमहिमा का चर्चा किया जायेगा, और जिसकी ओर यशायाह (६०:७) में संकेत किया गया है, वहमक्का में अल्लाह का पवित्र घर है, उस से तात्पर्य मसीह का गिरजाघर नहीं है जैसाकि ईसाई भाष्यकारों का मानना है। और केदार की भेड़ें जैसा कि आयत (७ )में उल्लिखितहै, कभी भी मसीह के गिरजाघर में नहीं आईं। और वास्तविकता यह है कि केदार के गावोंऔर उनके वासी ही इस संसार में एक मात्र लोग हैं जो कभी भी मसीही गिरजाघर की किसी शिक्षा से प्रभावित नहीं हुए हैं।
इसी प्रकार तौरातके व्यवस्था विश्वरण (अध्यायः३३)में दस हज़ार (१०,०००) सन्तों का उल्लेख महत्वपूर्ण अर्थ रखता है। "अल्लाह की ज्योतिपारान पर्वत से प्रकाशित हुई और उसके साथ दस हज़ार पवित्र लोग आए।" अगर आप पारानकी मरूभूमि से संबंधित सारा इतिहास पढ़ जायें तो आप को इसके अतिरिक्त कोई और घटनानहीं मिलेगी कि जब पैग़म्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मक्का को पराजितकिया तो मदीना नगर के अपने दस हज़ार अनुयायियों के साथ प्रवेश हुए और दोबारा अल्लाहके घर में लौट कर आए। आप के दाहिने हाथ में वह शरीअत (धर्म-शास्त्र) थी जिसने सारीशरीअतों (धर्म शास्त्रों) को राख का ढेर बना दिया। तथा 'मार्गदर्शक'और 'सत्य-आत्मा'जिसकी मसीह ने शुभ सूचना दी थी वह स्वयं मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम केअतिरिक्त कोई और नहीं है। यह सम्भव नहीं है कि हम उसे 'रूहुल-कुदुस' (पवित्र आत्मा) समझें जैसा कि कलीसाई धामिर्क सिद्धान्तों (चर्च) का मानना है। क्योंकि मसीह का कहनाहैः
"तुम्हारे लिए यह उचित है कि मैं दूर चला जाऊँ, इसलिए कि अगर मैं दूर नहींजाता हूँ तो "मार्गदर्शक" तुम्हारे पास नहीं आयेगा, किन्तु अगर मैं यहाँ सेप्रस्थान कर जाता हूँ तो उसे मैं तुम्हारे पास भेज दूँगा।"
इन शब्दों का स्पष्टअर्थ यही है कि 'मार्गदर्शक'का मसीह के पश्चात आना अनिवार्य था और यह कि जब मसीह नेयह बात कही तो वह उस समय उनके साथ नहीं था। क्या इससे हमें यह समझना चाहिये कि मसीहबिना पवित्र आत्मा (रूहुल-क़ुदस) के थे यदि पवित्र आत्मा (रूहुल- कु़दस) का आगमनमसीह के प्रस्थान पर निर्भर था? इसके अतिरिक्त जिस प्रकार मसीह ने उसका उल्लेखकिया है वह उसे एक मनुष्य बनाकर पेश करता है आत्मा नहीः "वह अपनी ओर से नहींबोलेगा, बल्कि जो कुछ वह सुनेगा वही लेगों पर दोहरा देगा।" तो क्या हमारे लिए यहसमझना आवशयक है कि अल्लाह और पवित्र आत्मा (रूहुल-कु़दस) दो अलग अस्तित्व हैं औरपवित्र आत्मा (रूहुल-क़ुदस)
अपनी ओर से भी बोलता है और जो कुछ अल्लाह से सुनताहै?
मसीह के शब्द स्पष्ट रूप से अल्लाह के भेजे हुए कुछ संदेशवाहकों की ओर संकेतकरते हैं। वह उसे सत्य आत्मा के नाम से पुकारते हैं और क़ुरआन भी मुहम्मदसल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बारे में ठीक इसी प्रकार बात कहताहैः

"बल्किवह (पैग़म्बर मुहम्म्द) तो सत्य (सच्चा धर्म) लाये हैं और सब पैग़म्बरों को सच्चा जानतेहैं।" (सूरतुस-साफ्फातः३७)

कुछ अकली तर्क- मुहम्‍मद सल्‍ल. के ईशदूत और संदेशवाहक होने की सत्यता पर mohammad

हज़रत पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ईशदूत और संदेशवाहक होने की सत्यता पर कुछ अकली तर्क (पहला भाग)
१.पैग़म्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अनपढ़ थे, लिखना और पढ़ना नहीं जानते थे और ऎसी क़ौम में थे जो अनपढ़ थी,उसमें लिखना-पढ़ना बहुत ही कम लोग जानते   थे। और यह केवल इस कारण था ताकि कोई संदेह करने वाला उस वह्य में संदेह न कर सके जो आप पर अल्लाह की ओर से उतरती थी, और झूठ मूट यह न गुमान कर बैठे कि उसे आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी ओर से संपादन कर (गढ़) के पेश कर दिया है। अल्लाह तआला ने फरमायाः
"इस से पहले तो आप कोई किताब पढ़ते न थे और नकिसी किताब को अपने हाथ से लिखते थे कि यह मिथ्यावादी लोग संदेह में पड़ते।" (सूरतुल-अनकबूतः ४८)              
आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ऎसी चीज़ पेश की जिसने अरब को उसके समान कोई चीज़ पेश करने से विवश और बेबस कर दिया और अपनी फसाहत व बलागत (लाटिका) से उन्हें चकित कर दिया। इस प्रकार  आपका अनश्वर चमत्कार वह क़ुरआन है जो आप पर अवतरित हुआ है। पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम फरमाते हैं:
"पैग़म्बरों में से प्रत्येक पैग़म्बर को कुछ न कुछ निशानी (चमत्कार) दी गई थी जिस पर लोग ईमान लाये, और मुझे जो चमत्कार (निशानी) दिया गया है वो वह्य     है  जिसे अल्लाह  तआला ने मेरे ऊपर उतारी है, और मुझे आशा है कि कि़यामत के दिन मेरे मानने वाले सब से अधिक होंगे।" (सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम)
आपकी क़ौम के लोग अरबी भाषा के माहिर और निपुण और फसाहत से पूर्ण थे किन्तु फिर भी अल्लाह तआला ने उन्हें क़ुरआन के समान कोई चीज़ प्रस्तुत करने के लिए चैलेंज किया तो वह बेबस हो गये, फिर उन्हें क़ुरआन के समान एक सूरत अध्याय प्रस्तुत करने के लिए चैलेंज किया फिर भी वह असमर्थ रहे। अल्लाह तआला ने   फरमायाः
"हम ने जो कुछ अपने बन्दे पर उतारा है उस में अगर तुम्हें  संदेह हो और तुम सच्चे हो तो उस जैसी एक सूरत तो बना लाओ, तुम्हें  अधिकार है कि अल्लाह के अतिरिक्त अपने सहयोगियों को भी बुला लो।" (सूरतुल-बक़राः २३)
बल्कि सर्व संसार के लोगों को चैलेंज किया, अल्लाह तआला ने फरमायाः

"कह दीजिये कि अगर तमाम इन्सान और सारे जिन्नात मिल कर इस क़ुरआन के समान लाना चाहें तो उन सब के लिए इसके समान लाना असंभव है चाहे वह आपस में एक दूसरे के लिए सहयोगी भी बन जायें।" (सूरतुल इस्राः८८)
२. पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम निरंतर लोगों को अल्लाह की ओर बुलाते और आमंत्रण देते रहे जबकि आप को अपनी क़ौम की ओर से बहुत अधिक कठिनाईयों और टकरावों का सामना हुआ, यहाँ तक कि वो लोग आप को जान से मार डालने और आपकी दावत का अंत कर देने के लिए आप के विरूद्ध षड्यंत्रण करने की हद तक पहुँच गये। इन सारी चीज़ों के होते हुए भी आप निरंतर उस दीन के प्रचार में जुटे रहे जिसके साथ आप को भेजा गया था और अल्लाह के दीन को फैलाने के रास्ते में आप को अपनी क़ौम की ओर से जिस कष्ट, परेशानी, कठिनाई और अत्याचार का भी सामना हुआ उस पर धैर्य करते रहे। अगर आप मिथ्यावादी होते -और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम कदापि ऎसा नहीं थे- तो आप धर्म प्रचार को त्याग देते और अपनी जान जोखों में न डालते; इस लिए कि आप देख रहे थे कि आप की पूरी क़ौम आपके विरूद्ध एक जुट हो गई है और आप का और आप की दावत का अंत करने के लिए गंभीरता का प्रदर्शन कर रही है।
डा. एम. एच. दुर्रानी (M.H. Durrani ) कहते हैं :
"यह विश्वास, यह तीव्र प्रयास और यह दृढ़ता और पक्का संकल्प  जिसके द्वारा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने आन्दोलन का अंतिम सफलता  तक नेतृत्व किया, इस बात का प्रबल प्रमाण है कि आप अपनी दावत में क़तई सच्चे थे, क्योंकि अगर आप के मन में तनिक भी संदेह या व्याकुलता होती तो आप उस आँधी तूफान के सामने कभी टिक नहीं पाते जिसके शोले पूरे बीस साल तक भड़कते रहे। क्या इसके बाद उद्देश्य में पूर्ण सच्चाई, व्यवहार में दृढ़ता (सदव्यवहार) और मन की सवोर्च्चता का कोई और प्रमाण हो सकता है? यह सारे अस्बाब व अवामिल कारण अनिवार्य रूप से इस परिणाम-निष्कर्ष- तक पहुँचाते हैं जिसे स्वीकारने बिना कोई छुटकारा नहीं कि यह व्यक्ति अल्लाह का सच्चा संदेश्वाहक (पैग़म्बर) है, यह हमारे पैग़म्बर मुहम्मद  सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं। आप अपने अनुपम गुणों में एक चिन्ह, प्रतिष्ठा और अच्छाई व भलाई के पूर्ण आदर्श और सच्चाई एवं निःस्वाथर्ता की अलामत पहचान थे। आप का जीवन, आपके विचार, आप की सच्चाई, आपकी धर्म निष्ठता, आपका संयम, आपकी सखावत व दानशीलता, आप का विश्वास एवं श्रद्धा और आपके कारनामे यह सब के सब आप की नुबुव्वत (ईश्दूतत्व) के अद्वितीय प्रमाण हैं। जो व्यक्ति भी निष्पक्षता के साथ आप के जीवन और संदेश को पढ़ेगा, वह इस बात की गवाही देगा कि वाक़ई आप अल्लाह के भेजे हुए पैग़म्बर हैं, और क़ुरअन  जिसे आप लोगों के लिए लेकर आये हैं, वह अल्लाह की सच्ची किताब है। प्रत्येक गंभीर, न्याय प्रिय विचारक जो सत्य का इच्छुक है वह अवश्य इस निर्णय तक पहुँचेगा।"
३.यह बात  स्पष्ट है कि प्रत्येक मनुष्य स्वभाविक रूप से इस सांसारिक जीवन के उपकरणों जैसे माल-धन, खाने-पीने की चीज़ें और शादी-विवाह को पसंद करता है। अल्लाह तआला ने  फरमायाः

"इच्छित चीज़ों की रूचि लोगों के लिए सुंदर बना दी गई है, जैस स्त्रियाँ और बेटे और सोने और चाँदी के इकटठा किये हुए खज़ाने और चिन्ह वाले घोड़े और चौपाये और खेती, यह    सांसारिक जीवन का  सामान है और लौटने का अच्छा ठिकाना तो अल्लाह तआला ही के पास है।"(सूरा आल-इम्रानः१४)
मनुष्य इन उपकरणों को विभिन्न साधनों और तरीक़ों से प्राप्त करने के लिए भरपूर प्रयास करता है। किन्तू उन्हें प्राप्त करने के ढंग और तरीक़े में लोग विभिन्न हैं, कुछ लोग उन्हें उचित (धर्मसम्मत) साधन से कमाते हैं और कुछ लोग अनुचित और अवैध ढंग से कमाते हैं।
जब हम ने यह जान लिया, तो हम कहते हैं कि जब पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी दावत का आरंभ किया तो आप की क़ौम ने आप से मोल-भाव किया और सारी लुभाने वाली चीज़ों और सांसारिक उपकरणों के द्वारा आप को उकसाया और आप की समस्त इच्छाओं और मांगों को पूरा करने का वादा किया; अगर आप सरदारी चाहते हैं तो वह आप को सरदार बना लेंगे, और अगर विवाह करना चाहते हैं तो सब से सुंदर स्त्रीसे आप का विवाह कर देंगे और अगर आप धन-दौलत चाहते हैं तो वह भी देने के लिए तैयार हैं, केवल एक शर्त मान लें कि इस नये धर्म को और उसकी ओर लोगों को बुलाना छोड़ दें। इस पर आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ईश्वरीय निर्देश से प्राप्त विवास के साथ उन्हें उत्तार दियाः
"अल्लाह की क़सम! अगर ये लोग सूर्य को मेरे दाहिने हाथ में और चाँद को बायें हाथ में रख दें और यह चाहें कि मैं इस मामले को छोड़ दूँ तो मैं इसे नहीं छोड़ सकता यहाँ तक कि अल्लाह तआला इस को प्रभुत्व प्रदान कर दे, या इस के लिए मेरी जान चली जाये।" (सीरत इब्ने हिाशम २/१०१) यदि आप मिथ्यावादी होते -और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम कदापि ऎसा नहीं थे- तो इस सौदा मोल-भाव को स्वीकार कर लेते और इस अवसर का भरपूर लाभ उठाते; क्योंकि आप के सामने जो कुछ पेश किया गया था, वह हर उस व्यक्ति की सबसे श्रेष्ठ इच्छा होती है जिसका लक्ष्य दुनिया होता है।
डॉ एम एच दुर्रानी  (Dr.M.H.Durrani) कहते हैं :
"पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने निरंतर तेरा साल मक्का में और निरंतर आठ साल मदीना में कठिनाईयाँ और परेशानियाँ झेलीं, पर आप अपने दृष्टि-कोण से एक बाल भी नहीं हटे, आप पक्के इरादे वाले, निडर एवं बहादुर और अपने लक्ष्यों और दृष्टि-कोण में दृढ़ और पक्के थे। आप के समुदाय ने आप के सामने यह प्रस्ताव रखा कि यदि आप अपने धर्म की ओर बुलाने और अपने संदेश को फैलाने से रूक जायें तो वह आप को अपना राजा बना लेंगे और देश का सारा धन-दौलत आपके पैरों में डाल देंगे। परन्तु आप ने इन सारे बहलावों और फुसलावों को नकार दिया और उनके स्थान पर अपनी दावत (निमंत्रण) के लिए कठिनाईयों को झेलना पसंद कर लिया। आप ने ऎसा क्यों किया? आप ने कभी धन-दौलत, पद, राज्य, वैभव, विश्राम, आराम, सुख-चैन और संपन्नता और खुशहाली की परवाह क्यों नहीं की? यदि कोई आदमी इसका उत्तार जानना चाहता है तो उसके लिए आवश्यक है कि वह इस बारे में बड़ी गहराई से सोच विचार करे।"
४.यह बात सुप्रसिद्ध और मुशाहिदे में है कि जो व्यक्ति भी किसी राज्य का शासन या नेतृत्व संभालता है तो उसके शासन के अधीन सारा धन दौलत और प्रजा उसके अधिकार में होती है और उसकी सेवा के लिए नियुक्त होती है। किन्तु जहाँ तक मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का संबंध है तो आप जानते थे कि यह दुनिया स्थायी और सदा रहने वाला आवास नहीं है। इब्राहीम बिन अलक़मा से रिवायत है कि अब्दुल्लाह ने कहा किः पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम एक (नंगी) चटाई पर लेटे हुये थे जिस से आप के शरीर (चमड़ी) पर निाशन पड़ गये थे। यह देख कर मैं ने कहाः ऎ अल्लाह के पैग़म्बर! मेरे माता पिता आप पर क़ुर्बान! अगर आप हमें आज्ञा देते तो हम इस पर आप के लिए कोई बिछौना बिछा देते जिस से आप के शरीर की सुरक्षा होती। इस पर अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः "मुझे दुनिया से क्या लेना देना, मेरा और दुनिया का उदाहरण एक सवार की तरह है जिसने एक पेड़ के नीचे आराम किया फिर उसे छोड़ कर प्रस्थान कर गया।" (सुनन र्तिमिज़ी)
और आप के बारे में नोमान बिन बशीर रजि़यल्लाहु अन्हु कहते हैं: मैं ने तुम्हारे पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को देखा है कि एक समय आप अपना पेट भरने के लिए रद्दी खजूर भी नहीं पाते थे। (मुस्लिम)
अबू हुरैरा रजि़यल्लाहु अन्हु कहते हैं: मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के घराने वालों ने लगातार तीन दिन तक पेट भर कर खाना नहीं खाया यहाँ तक कि आप का स्वर्गवास हो गया। (सहीह बुख़ारी व सहीह मुस्लिम)
जब कि अरब द्वीप आपके शासन अधीन था और मुसलमानों को प्राप्त होने वाली प्रत्येक भलाई और कल्याण के कारण आप ही थे। फिर भी कुछ समय आप के पास पर्याप्त खाना नहीं रहता था। आपकी पत्नी आइशा रजि़यल्लाहु अन्हा कहती हैं : पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कुछ समय के लिए (उधार पर) एक यहूदी से खाद्दान्न खरीदा और अपनी कवच (जि़रह) को उसके पास गिरवी रख दी। (सहीह बुख़ारी)
इस का यह अर्थ नहीं है कि आप जो चीज़ चाहते थे, उसे प्राप्त करना आप के बस की बात नहीं थी। क्यों कि मस्जिदे नबवी में धन-दौलत के ढेर के ढेर आप के सामने रखे जाते थे और उस समय तक आप अपने स्थान से नहीं उठते थे और न आप को चैन आता था जब तक कि आप उसे गरीबों और धनहीन लोगों को बांट नहीं देते थे। यही नहीं बल्कि आप के साथियों में बड़े-बड़े धन-दौलत और पूंजी वाले लोग थे और आप की सेवा के लिए एक दूसरे से आगे बढ़ने का प्रयास करते थे, और आप के लिए (सब कुछ) बहुमूल्य से बहुमूल्य चीज़ों को निछावर कर देते थे। किन्तु पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम दुनिया की वास्तविकता को जानते थे। आप का फरमान हैः
"अल्लाह की क़सम आखि़रत के सामने दुनिया की वास्तविकता ऎसे ही है जैसे कि तुम में से कोई आदमी अपनी इस अंगुली -आप  ने शहादत की अंगुली की ओर संकेत किया- को समुद्र में डाल कर देखे कि उस में कितना पानी आता है।" (सहीह मुस्लिम)
लेडी इ॰ कोबोल्ड (Lady E.Cobold) अपनी पुस्तक 'मक्का का हज्ज' (लन्दन १९३४) में कहती हैः
जबकि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अरब द्वीप के नायक थे... पर उन्होंने उपाधियों के बारे में नहीं सोचा, और न ही उस से लाभ उठाने का प्रयास किया, बल्कि इस बात पर निर्भर करते हुए अपनी हालत पर बाक़ी रहे कि वह अल्लाह के पैग़म्बर हैं और मुसलमानों के सेवक हैं। वह स्वयं ही अपने घर की सफाई करते थे और अपने हाथ से अपने जूते की मरम्मत करते थे। दयालु, दानशील और सदाचारी थे जैसे कि वह बहने वाली हवा हों। कोई फक़ीर या भिखारी आप के पास आता तो जो कुछ आप के पास होता उसे प्रदान कर देते थे, और अधिकांश समय आप के पास थोड़ा ही होता था जो उसके लिए पर्याप्त नहीं होता था।"
५. पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कुछ ऎसे दुर्लभ घटनाओं का सामना होता था जिन के स्पष्टीकरण की आवश्यकता होती थी, किन्तू उसके वि्षाय में आप पर वह्य (ईश्वाणी) न उतरने के कारण आप उसके संबंध में कुछ नहीं कर पाते थे। इसलिए वह्य उतरने से पहले की अवधि को आप दुःख, चिन्ता और शोक की अवस्था में बिताते थे। इसी में से एक इफ्फक  की घटना है जिस में पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सतीत्व पर आरोप लगाया गया। चुनांचे आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम एक महीना तक इस स्थिति में ठहरे रहे कि आप के दुश्मन आप के बारे में अनुचित बातें करते रहे, आपके सतीत्व को निशाना बनाते रहे, यहाँ तक कि वह्य उतरी जिस ने आपकी पत्नी (आइशा रजि़यल्लाहु अन्हा) को उस आरोप से मुक्त और पवित्र घोषित कर   दिया जिस से उन को आरोपित किया गया था। यदि आप मिथ्यावादी होते -और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम कदापि ऎसा नहीं थे- तो इस समस्या का उसी समय समाधान कर देते, किन्तु वास्तविकता यह थी कि आप अपनी इच्छा से कोई बात नहीं कहते थे।
६.  पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने लिए मानव जाति से बढ़ कर किसी पद का दावा नहींकिया। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम यह बात पसंद नहीं करते थे कि आप के साथ कोई ऎसा व्यवहार किया जाए जो प्रतिष्ठा और महानता का प्रतीक हो। अनस रजि़यल्लाहु अन्हु कहते हैं: सहाबा के निकट पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से अधिक प्रिय कोई और नहीं था। तथा उन्होंने कहाः और जब वह लोग आप को देखते तो आप के लिए खड़े नहीं होते थे; इसलिए की वह जानते थे कि आप इस से घृणा करते हैं। (सुनन र्तिमिज़ी)
वाशिंगटन इरविंग  (w.Irving) कहता हैः
"पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की फौजी सफलताओं ने उनके अंदर अभिमान, र्गव एंव घमण्ड नहीं पैदा किया। वह केवल इस्लाम के लिए युद्ध करते थे, किसी व्यक्तिगत (निजी) लाभ अथवा स्वार्थ के लिए नहीं। यहाँ तक कि महानता और श्रेष्ठता की चरम सीमा पर पहुँच कर भी पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी सामान्य सरलता, सहजता और नम्रता को संभाल कर रखा। यदि आप किसी कमरे में लोगों के समूह पर प्रवेश करते तो इस बात को नापसंद करते थे कि वह लोग आप के स्वागत के लिए खड़े हो जायें, या असाधारण रूप से आप का अभिनन्दन  करें। अगर आप का लक्ष्य एक महान राज्य स्थापित करना था तो वह इस्लामिक राज्य है, जिसमें आप ने न्याय के साथ शासन किया, और आप ने यह नहीं सोचा कि उस राज्य के शासन को अपने खानदान के लिए उत्तराधिकार बना दें।"
७. क़ुरआन में कुछ आयतें ऎसी उतरी हैं जिन में पैग़म्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की उनके किसी कार्यवाही या दृष्टि पर निन्दा और डाँट-डपट की गई है, उदाहरण स्वरूपः प्रथमः
अल्लाह तआला का यह कथन हैः
"ऎ नबी! (ईश्दूत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) जिस चीज़ को अल्लाह ने आप के लिए हलाल कर दिया है उसे आप क्यों हराम करते हैं? क्या आप अपनी पत्नियों की प्रसन्नता प्राप्त करना चाहते हैं? और अल्लाह तआला क्षमा   करने वाला दया करने वाला है।"(सूरा तहरीमः१)           
इसकी पृ्ष्ठभूमि यह है कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी कुछ पत्नियों के कारण अपने ऊपर शहद खाना हराम कर लिया था। अतः आप के अल्लाह की हलाल की हुई चीज़ को अपने ऊपर हराम कर लेने के कारण आप के पालनहार की ओर से आप की निंदा की गई।


(दूसरा भाग)

दूसराः  अल्लाह तआला का यह फर्मान हैः

"अल्लाह तुझे क्षमा कर दे, तू ने उन्हें क्यों अनुमति दे दी? बिना इसके कि तेरे सामने सच्चे लोग खुल जाएं और तू झूठे लोगों को भी जान ले। (सूरा तौबाः ४३)
इस आयत में अल्लाह तआला ने आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की इस बात पर निंदा और डाँट-डपट की है कि आप ने तबूक के युद्ध से पीछे रह जाने वाले मुनाफिक़ों के झूठे बहानों को स्वीकार करने में शीघ्रता क्यों की? चुनांचे मात्र उनके क्षमायाचना करने पर ही उन्हें क्षमा कर दिया उनकी छान-बीन और जाँच-पड़ताल नहीं की ताकि सच्चे और झूठे की पहचान कर सकें।
तीसराः अल्लाह तआला का यह फर्मान,


"नबी के हाथ में बन्दी नहीं चाहियें जब तक कि धरती में अच्छी रक्तपात की युद्ध न हो जाये। तुम तो दुनिया का धन-दौलत चाहते हो और अल्लाह की इच्छा आखि़रत की है, और अल्लाह सर्व शक्तिमान और सर्व तत्वदर्शी है। अगर पहले ही से अल्लाह की ओर से बात लिखी हुई न होती तो जो कुछ तुम ने लिया है उस बारे में तुम्हें कोई बड़ी सज़ा होती।" (सूरा अनफालः ६७,६८)
आइशा रजि़यल्लाहु अन्हा कहती हैं : यदि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह की उतारी हुई आयतों में से कोई चीज़ छुपाये होते तो इस आयत को अवश्य छुपाते :

"और तू अपने दिल में वह बात छुपाये हुये था जिसे अल्लाह ज़ाहिर करने वाला था और तू लोगों से डरता था, हालाँकि अल्लाह तआला इस बात का अधिक योग्य था कि तू उस से डरे।" (सूरा अहज़ाबः ३७) (सहीह बुख़ारी व सहीह मुस्लिम)
तथा अल्लाह तआला का फरमान हैः

"ऎ पैग़म्बर आप के अधिकार में कुछ नहीं।"(सूराआल-इम्रानः १२८)
तथा अल्लाह तआला का फरमान हैः

"उसने विमुखता प्रकट की और मुँह मोड़ लिया (केवल इस लिए) कि उस के पास एक अंधा आया। तुझे क्या पता शायद वह संवर जाता या उपदेश सुनता और उपदेश उसे लाभ पहुँचाता।"(सूरत अबसः १-४)
यदि आप मिथ्यावादी होते -और  आप सल्लल्लाहु   अलैहि  व सल्लम कदापि ऎसा नहीं थे- तो यह आयतें जिन में पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की डाँट-डपट और निंदा की गई है क़ुरआन में न होतीं।
लाईटनर (Lightner) अपनी पुस्तक 'इसलाम धर्म' में कहता हैः
"एक बार अल्लाह तआला ने अपने नबी की ओर एक ऎसी वह्य अवतरित की जिस में आप की सख्त पकड़ की गई थी, इस लिए कि आप ने अपने चेहरे को एक ग़रीब अंधे आदमी से फेर लिया था ताकि एक धनवान प्रभावशाली आदमी से बात करें। और आप ने उस वह्य का प्रसार किया और उसे फैलाया। यदि आप वैसे ही होते जैसाकि मूर्ख ईसाई आप के संबंध में कहते हैं, तो इस वह्य का वजूद न होता।"
८.पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सच्चे नबी और पैग़म्बर होने तथा  आप जो  कुछ लेकर आये हैं उसकी सच्चाई का निश्चित प्रमाण सूरतुल-मसद्द है जिसमें इस बात का निश्चित फैसला है कि आप का चाचा अबू-लहब जहन्नम में प्रवेश करेगा, और यह सूरत आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की दावत के शुरू शुरू में उतरी है, अतः यदि आप मिथ्यावादी होते -और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम  कदापि ऐसा नहीं थे- तो इस प्रकार निश्चित फैसला न घोषित करते इसलिए कि हो सकता है कि आप का चाचा मुसलमान हो जाये???
डा॰ गेरी मिलर (Gary Miller) कहता हैः यह व्यक्ति अबू-लहब इस्लाम से इस हद तक घृणा करता था कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जहाँ भी जाते वह आप के पीछे-पीछे चलता ताकि जो कुछ पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम कहते उसके महत्त्व को कम कर सके। यदि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को अपरिचित और अनजाने लोगों से बात करते हुए देखता तो प्रतीक्षा करता रहता यहाँ तक कि आप अपनी बात खत्म करें ताकि वह उनके पास जाए, फिर उन से पूछता कि मुहम्मद ने तुम से क्या कहा है? अगर वह तुम्हें कोई चीज़ सफेद बताए तो समझो कि वह काली है और वह तुम से रात कहे तो वास्तव में वह दिन है। कहने का मक़सद यह है कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जो चीज़ भी कहते वह उसका विरोध करता था और लोगों को उसके बारे में शक में डालता था। अबू लहब की मृत्यु से दस साल पहले क़ुरआन की एक सूरत उतरी जिसका नाम 'सूरतुल मसद'  है, यह सूरत बतलाती है कि अबू लहब आग (नरक) में जाएगा, यानी दूसरे शब्दों में उसका अर्थ यह हुआ कि अबू लहब कभी भी इस्लाम में प्रवेश नहीं करेगा।
(मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को झूठा साबित करने के लिए पूरे दस सालों के दौरान अबू लहब को केवल यह करना चाहिए था कि वह लोगों के सामने आ कर कहताः मुहम्मद मेरे बारे में यह कहता है कि मैं शीघ्र ही आग (नरक) में जाऊँगा, किन्तु मैं अब यह घोषणा  करता हूँ कि मैं इस्लाम स्वीकार करना चाहता हूँ और मुसलमान बनना चाहता हूँ !!अब तुम्हारा क्या विचार है क्या मुहम्मद अपनी बात में सच्चा है या नहीं? क्या उसके पास जो वह्य आती है वह ईश्वरीय वह्य  है? किन्तु अबू लहब ने ऎसा बिल्कुल नहीं  किया जबकि उसका सारा काम पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का विरोध करना था लेकिन उसने इस मामले में आप का विरोध नहीं किया। यह कहानी गोया यह कह रही है कि  पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अबू लहब से कहते हैं कि तू मुझ से घृणा करता है और मुझे खत्म कर देना चाहता है। ठीक है मेरी बात का तोड़ करने का तेरे पास अच्छा अवसर है! किन्तु पूरे दस साल के बीच उसने कुछ नहीं किया!! न तो वह इस्लाम लाया और न ही कम से कम दिखाने के लिए इस्लाम क़बूल किया!
दस साल तक उसके लिए यह अवसर था कि एक मिनट में इस्लाम को ध्वस्त कर दे ! किन्तु यह बात मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की बात नहीं थी बल्कि उस हस्ती की ओर से वह्य थी जो ग़ैब (परोक्ष) को जानती है और उसे पता था कि अबू लहब कभी भी इस्लाम नहीं लायेगा।
अगर यह अल्लाह की ओर से वह्य न होती तो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इस बात को कैसे जान सकते थे कि जो कुछ सूरत में बताया गया है अबू लहब उस को साबित कर दिखायेगा?? अगर उन्हें यह पता नहीं होता कि यह अल्लाह की ओर से वह्य है तो वह पूरे दस साल तक इस बात पर दृढ़ता और विश्वास के साथ क़ाइम न रहते कि उनके पास जो चीज़ है वह सत्य है। जो आदमी इस तरह का खतरनाक चैलेंज रखता है उसके पास केवल यही एक अर्थ होता है कि यह अल्लाह की ओर से वह्य है!.

"अबू लहब के दोनों हाथ टूट गये और वह स्वयं नष्ट हो गया। न तो उसका माल उसके काम आया और न उसकी कमाई। वह शीघ्र  ही भड़कने वाली आग में जायेगा। और उसकी बीवी भी (जायेगी) जो लकडि़याँ ढोने वाली है, उस की गदर्न में मूंज की बटी हुई रस्सी होगी।" (सूरतुल-मसदः १-५)
९.क़ुरआन की एक आयत में 'मुहम्मद' के बदले 'अहमद' का नाम आया है, अल्लाह तआला ने फरमायाः
"और उस समय को याद करो जब मर्यम के बेटे ईसा ने कहा ऎ (मेरी क़ौम) बनी इस्राईल! मैं तुम सब की ओर अल्लाह का रसूल हूँ, मुझ से पहले की किताब तौरात की मैं पुष्टि (तसदीक़) करने वाला हूँ और अपने बाद आने वाले एक रसूल की मैं तुम्हें शुभ सूचना सुनाने वाला हूँ जिनका नाम अहमद है। फिर जब वह उनके पास स्पष्ट और खुले हुए प्रमाण लेकर आए तो ये कहने लगे यह तो खुला हुआ जादू है।" (सूरतुस्सफः ६)
अगर आप झूठे दावेदार होते -और आप हरगिज़ ऎसा नहीं थे- तो क़ुरआन में इस नाम का वर्णन न होता।

१० .आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का दीन आज तक क़ाइम है, और बराबर लोग बड़ी संख्या में इस में दाखिल हो रहे हैं और इसे अन्य धर्मों पर तरजीह (प्रधानता) दे रहें हैं, जबकि इस्लाम का दावती संघर्ष चाहे वह आर्थिक हो या मानवी जो इस्लाम के प्रसार एंव प्रचार के मैदान में किया जा रहा है वह कमज़ोर है, जबकि दूसरी ओर इस्लामी दावत के विरूद्ध किये जाने वाले संघर्ष बहुत शक्तिशाली और निरंतर हैं जो इस दीन को आड़े  हाथों लेने, इस को बदनाम करने और इसकी ओर से लोगों का ध्यान फेरने में कोई कमी नहीं करते हैं। यह केवल इस लिए है कि अल्लाह तआला ने इस दीन की हिफाज़त की जि़म्मे दारी ली है, अल्लाह तआला ने फरमायाः

"बेशक हम ने ही क़ुरआन को उतारा है और हम ही उसकी हिफाज़त करने वाले हैं।" (सूरतुल हिज्रः९)
अंग्रेज़ लेखक थामस कार्लायल (Th.Carlyle)
मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम  के बारे में कहता हैः
"क्या तुम ने कभी किसी झूठे आदमी को देखा है कि वह एक अनोखा दीन ईजाद अविष्कार  कर सकता है? वह ईंट का एक घर भी नहीं बना सकता! अगर वह चूना, गच्च और मटटी और इस प्रकार की अन्य चीज़ों की विशेषताओं को नहीं जानता है तो जो कुछ वह बनायेगा वह घर  नहीं है बल्कि वह मल्बे का ढेर और विभिन्न सामगि्रयों से मिला जुला एक टीला है। और वह इस बात के योग्य नहीं है की अपने स्तंभों पर बारह शताब्दी तक स्थापित रहे जिसमें बीस करोड़ मनुष्य बसते हों, बल्कि वह इस बात के योग्य है कि उसके स्तंभ ढह जायें और वह इस प्रकार ध्वस्त हो जाए कि उसका निशान भी न रह जाए। मुझे पता है कि मनुष्य पर अनिवार्य है कि वह अपने तमाम मामले में प्रकृति के क़ानून के अनुसार चले अन्यथा वह उसका काम करना बन्द कर देगी... वो काफिर लोग जो बात फैलाते हैं वह झूठ है चाहे वह उसको कितना ही बना सवाँर कर पेश करें यहाँ तक कि उसे वह सच्चा ख्याल करने लगें।.. यह एक सानिहा दुर्घटना है कि लोग राष्ट्र के राष्ट्र और समुदाय के समुदाय इन भ्रष्टाचारों के धोखे में आ जायें।"
चुनाँचे अल्लाह तआला की ओर से क़ुरआन की हिफाज़त और सुरक्षा के बाद क़ुरआन करीम एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी में किताबों और लोगों के सीनों में सुरक्षित कर दिया गया। क्योंकि उसको याद करना, उसकी तिलावत –पाठ- करना, उसको सीखना और सिखाना उन कामों में से है जिन्हें करने के मुसलमान बड़े इच्छुक होते हैं और उसके लिए दौड़ पड़ते हैं ताकि वह भलाई और कल्याण प्राप्त करें जिसका उल्लेख करते हुए पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः॑
"तुम में से सब से अच्छा –सर्वश्रेष्ट- वह आदमी है जो क़ुरआन सीखे और सिखाए।" (सहीह बुख़ारी)
क़ुरआन करीम में कुछ बढ़ाने या घटाने या उसके कुछ अक्षरों को बदलने के कई प्रयास किए गए किन्तु वह सारे प्रयास असफल हो गए, इसलिए कि उन्हें शीघ्र ही भाँप लिया गया और उनके और क़ुरआन की आयतों के बीच अन्तर को जानना सरल है।
जहाँ तक पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पवित्र सुन्नतों -अहादीसे पाक- की बात है जो इस्लाम धर्म -इस्लामी धर्म-शास्त्र- का दूसरा साधन है, उनकी हिफाज़त विश्वसनीय और भरोसे मन्द लोगों के द्वारा हुई है जिन्हों ने पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हदीसों को ढूँढने और ढूँढ-ढूँढ कर जमा करने के लिए अपने आप को समर्पित कर दिया। चुनाँचे सहीह (विशुद्ध) हदीसों को बाक़ी रखा और ज़ईफ –कमज़ोर- हदीसों को स्पष्ट किया और घढ़ी हुई हदीसों पर टिप्पणी की। जो आदमी हदीस की उन किताबों को देखे जो पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हदीसों से संबंधित हैं तो उसे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से सादिर होने वाली तमाम चीज़ों की हिफाज़त के लिए की जाने वाली कोशिशों और प्रयासों की हक़ीक़त का पता चल जायेगा और पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से जो हदीसें सहीह प्रमाणित हैं उनकी शुद्धता के बारे में उसके संदेहों का निवारण होजायेगा।
माईकल हार्ट –Michael Hart- अपनी "सौ प्रथम लोगों का अध्ययन" नामक किताब में कहता हैः
"मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने संसार के एक महान धर्म की स्थापना और प्रसार की और एक महान (हम यह कहते हैं कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पद का कोई और आदमी नहीं है बल्कि वह सबसे महान हैं) राजनीतिक विश्व व्यापी लीडर हो गये, चुनाँचे आज उनकी मृत्यु पर लगभग तेरह सदी बीत जाने के बाद भी उनका प्रभाव निरंतर शक्तिशाली और गहरा है।"
११. पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के द्वारा लाये हुए सिद्धांतों (उसूलों) की यथार्थता और उनका हर समय हर स्थान के लिए उचित और योग्य होना, तथा उन्हें लागू करने के जो अच्छे और शुभ परिणाम (नताईज) सामने आ रहे हैं - यह सब इस बात की गवाही देते हैं कि जो कुछ आप लेकर आए हैं, वह अल्लाह की ओर से वह्य है। तथा यहाँ पर यह प्रश्न है कि क्या पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के अल्लाह की ओर से भेजे हुए संदेशवाहक होने में कोई बाधा और रुकावट है जबकि आप से पहले बहुत से नबी और रसूल भेजे जा चुके हैं? अगर इसका उतर यह है कि इस में कोई अक़ली और शरई रुकावट नहीं है तो फिर (प्रश्न यह है कि) आप पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सारे लोगों के लिए पैग़म्बरी (ईश्दूतत्व) को क्यों नकारते हैं जबकि आप से पहले पैग़म्बरों की पैग़म्बरी को मानते हैं?!
१२.कारोबार, जंग, शादी-विवाह, आर्थिक मामलों, राजनीति और इबादतों...आदि के मैदान में मुहमम्द सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ज़ुबानी द्वारा इस्लाम ने जो संविधान और क़वानीन प्रस्तुत किये हैं, पूरी दुनिया के लोग एक साथ मिल कर भी उस तरह के संविधान और क़वानीन पेश नहीं कर सकते। फिर क्या यह बात समझ में आने वाली है कि एक अनपढ़ आदमी जो लिखना पढ़ना तक नहीं जानता था इस तरह का परिपूर्ण संविधान पेश कर सकता है जिसने पूरी दुनिया के मामले को संगठित कर दिया? क्या यह आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पैग़म्बरी और ईश्दूतत्व की सच्चाई को प्रमाणित नहीं करती और यह कि आप अपनी खाहिश इच्छा से कोई बात नहीं कहते थे?
१३.पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी दावत का आरंभ और उसका खुल्लम खुल्ला प्रसार उस समय किया जब आप चालीस साल की उमर को पहुँच गये और जवानी और शक्ति की अवस्था को पार कर गये और बुढ़ापा और आराम पसंदी की उमर आ गई।
थामस कार्लायल  अपनी किताब 'हीरोज़' में कहता हैः
"....जो लोग यह कहते हैं कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपनी पैग़म्बरी में सच्चे नहीं थे, उनके दावे का खण्डन करने वाली चीज़ों में से एक यह भी है कि उन्हों ने अपनी जवानी और उसके खूब सूरत दिनों को (खदीजा रजि़यल्लाहु अन्हा के साथ )चैन और आराम में बिताया और उस दौरान कोई ऎसी आवाज़ नहीं उठाई जिस के पीछे उनको कोई ?शोहरत, चर्चा, नामवरी, पद और शासन प्राप्त हो... और जब जवानी चली गई और बुढ़ापा आ घेरा तो आप के सीने में वह ज्वालामुखी फूट पड़ा जो मांद पड़ा था और आप एक महान और भव्य चीज़ की इच्छा करने लगे।"
आर॰ लानडाऊ (R.Landau )अपनी किताब 'इस्लाम और अरब' में कहता हैः
"मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का मिशन बहुत बड़ा था, वह ऎसा मिशन था जो किसी दज्जाल के बस में नहीं जिसे स्वाथिर्क प्रलोभन -कुछ नवीन योरपी लेखकों ने पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को इसी चीज़ से आरोपित किया है- इस बात की प्रेरणा दे रहे हों कि वह अपनी ज़ाती कोशिश और परिश्रम से उस लक्ष्य को प्राप्त करने में सफलता की आशा रखता हो। मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अपने पैग़ाम और संदेश को पहुँचाने में खुल कर सामने आने वाला इख़्लास और आप के मानने वालों का आप पर उतरी हुई वह्य  पर  मुकम्मल ईमान (विश्वास) और पीढि़यों और सदियों का अध्ययन और तजरूबा - यह सारी चीज़ें   मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को किसी प्रकार के ज्ञान पूर्वक धोखाबाज़ी से आरोपित किये जाने को ग़ैर माक़ूल (तर्कहीन, बुद्धिहीन) और अनाधार ठहराती हैं, और इतिहास में किसी दानिस्ता -ज्ञान पूर्वक- (धार्मिक) जालसाज़ी का पता नहीं चलता है जो एक लम्बे समय तक बाक़ी रही हो,और इस्लाम अभी तेरह सौ साल से भी अधिक समय से बाक़ी ही नहीं है बल्कि हर साल उस के नये नये मानने वाले लोग पैदा हो रहे हैं। इतिहास के पन्ने किसी झूठे-फरेबी का एक उदाहरण भी नहीं पेश कर सकते जिसके संदेश को दुनिया के राज्यों में से एक राज्य और एक सबसे अधिक कुलीन सभ्यता को जन्म देने का आश्रय प्राप्त हो।"

धन्‍यवाद